समालखा। नई अनाज मंडी स्थित जैन स्थानक में उपेंद्र मुनि ने आत्म समाधि पर प्रवचन देकर लोगों को जागृत किया। मुनि ने बताया कि आत्म समाधि योग की वह परम अवस्था है जहां चित्त की सभी वृत्तियां रुक जाती हैं और व्यक्ति अपने वास्तविक स्वरूप में विलीन हो जाता है, बाहरी जगत से उसका संपर्क टूट जाता है और उसे शांति, आनंद तथा एकता का अनुभव होता है।
यह ध्यान और आत्म-साक्षात्कार की एक गहन प्रक्रिया है जो सांसारिक इच्छाओं से ऊपर उठने और स्वयं को सभी बंधनों से मुक्त करने से प्राप्त होती है। जैन धर्म में इसे समाधि-मरण के रूप में भी जाना जाता है। साधक को अपने वास्तविक स्वरूप का ज्ञान होता है जो ब्रह्मांड से एकाकार होता है। समाधि की अवस्था तक पहुंचने के लिए निरंतर ध्यान का अभ्यास आवश्यक है। मोक्ष प्राप्ति संभव, कठोर वचन न बोलने वाला, शास्त्रों में दिए तत्त्वों को भली भांति जानने वाला निरंतर मोक्ष की अभिलाषा रखने वाला, इंद्रियों का दमन करने वाला मुनि शीघ्र ही मुक्त हो जाता है जिसका मन द्वन्द्वों में राग-द्वेषादिभावों में एक समान रहता है उसमें ही परमात्मा समाहित है। उसके लिए सर्दी-गर्मी, सुख-दुख, मान-प्रतिष्ठा सब बराबर होते हैं। जिस योगी की आत्मा ज्ञान-विज्ञान से युक्त है। इस अवसर पर साजी जैन, राजेन्द्र जैन, पवन जैन, अमित जैन, गौरव जैन, विनीत जैन व मोहित जैन उपस्थित रहे।