पानीपत। जिले के चार खिलाड़ियों रेखा, अर्नव, अक्षरा और एंजेल ने थांग ता चैंपियनशिप में स्वर्ण जीतकर अपने-अपने पिता के सपने को पूरा किया। कुरुक्षेत्र के लाडवा में इस प्रतियोगिता का आयोजन हुआ था।
इन खिलाड़ियों में किसी के पिता चाय बेचते हैं तो किसी के मजदूरी करते हैं, लेकिन इन्होंने अपने बच्चों की ट्रेनिंग में आर्थिक हालात आड़े नहीं आने दिए। एक खिलाड़ी ने तो नगर निगम में नौकरी के साथ-साथ अपनी ट्रेनिंग भी जारी रखी। इन सभी खिलाड़ियों के कोच संदीप हैं। उन्होंने खुद भी इसी चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक जीता है।
नगर निगम में नौकरी करने के साथ ही रोज तीन घंटे किया अभ्यास
नगर निगम में कर्मचारी रेखा नौकरी के साथ ही रोज तीन घंटे थांग ता का अभ्यास करती थीं। शाम पांच बजे अपनी ड्यूटी पूरी करने के बाद किया गया अभ्यास रंग लाया। कुरुक्षेत्र में आयोजित चैंपियनशिप में रेखा ने स्वर्ण पदक जीता है। अब उनका सपना है कि वह वर्ल्ड थांग ता चैंपियनशिप में स्वर्ण लेकर आएं। उन्होंने मणिपुर में आयोजित नेशनल चैंपियनशिप में कांस्य पदक जीत पिता का सपना पूरा किया था। रेखा ने बताया कि उनके पिता सुभाष चंडालिया नगर निगम सफाई कर्मचारी संघ के प्रधान हैं।
चाय की दुकान चलाकर बच्चों को खिलाई थांग ता
चाय की दुकान चलाकर बेटे अर्नव और बेटी अक्षरा को थांग ता खिलावाने वाले पिता का सपना पूरा हुआ। बच्चों ने राज्य स्तरीय थांग ता चैंपियनशिप में स्वर्ण पदक प्राप्त कर उनका नाम रोशन किया है। अर्नव और अक्षरा ने बताया कि लॉकडाउन लगने पर पिता का रोजगार खत्म हो गया था। फिर भी पिता ने उनकी ट्रेनिंग बंद नहीं होने दी। न ही डाइट में कोई कमी आने दी। पिता और कोच संदीप के प्रयासों से वह स्वर्ण पदक जीत सके हैं।
कक्षा आठ की छात्रा एंजेल ने जीता स्वर्ण पदक
प्रयाग इंटरनेशनल स्कूल में आठवीं कक्षा की छात्रा एंजेल बेनीवाल ने राज्य स्तरीय थांग ता प्रतियोगिता में स्वर्ण पदक जीता है। एंजल के पिता संदीप बेनिवाल का सपना था कि बेटी खिलाड़ी बने। एंजल की मां एवं मॉडल रजनी बेनिवाल ने बताया कि हाल ही में जम्मू में आयोजित नेशनल चैंपियनशिप में बेटी ने भाग लिया था। स्कूल गेम्स एसजीएफआई में भी एंजेल का चयन हो चुका है। कोच संदीप कुमार एंजल को रोज तीन से चार घंटे अभ्यास कराते हैं।
थांग ता का परिचय
थांग ता मणिपुर के एक प्राचीन युद्धकला है। इसमें ‘थांग’ का अर्थ होता है तलवार और ‘ता’ का मतलब है भाला। इस प्रकार समझ सकते हैं कि इस खेल में तलवार, ढाल और भाले का उपयोग होता है। इसका जन्म मणिपुर प्रदेश में वर्ष 1891 में ‘मीतेई रेस’ नामक प्रजाति में ‘कंगलीपैक’ नामक स्थान पर हुआ माना जाता है।
पानीपत। अरनव।- फोटो : Panipat
पानीपत। अक्शरा।- फोटो : Panipat
पानीपत। रेखा।- फोटो : Panipat