पंजीकरण करवाने के लिए लाइन में लगे मरीज। संवाद
पानीपत। आधुनिक समय में जहां एकल परिवार बढ़ गए हैं वहीं परिवार में माता-पिता दोनों का काम के लिए घर से बाहर जाना से बच्चों में पारिवारिक मेल-जोल तो कम हो ही रहा है साथ ही बच्चों का यह अकेलापन उन्हें मोबाइल से ज्यादा जोड़ रहा है। आज के समय में बच्चे मोबाइल से इतने जुड़ गए हैं कि इससे उनकी आंखों तो प्रभावित हो ही रही हैं साथ ही नींद प्रभावित होकर मानसिक स्थिति भी बिगड़ रही है। जिला नागरिक अस्पताल में मनोरोग विशेषज्ञ के पास हर रोज दो से तीन मामले ऐसे पहुंचने लगे हैं। बच्चों की काउंसलिंग कर उनका सही मार्गदर्शन किया जा रहा है और दवा से इलाज किया जा रहा है।
जिले में मनोरोग से पीड़ित लोगों की संख्या बढ़ रही है। इसमें ज्यादातर बच्चे शामिल होने लगे है। इसका मुख्य कारण बच्चों का परिवार से दूरी और मोबाइल में बढ़ी रुचि है। जिला नागरिक अस्पताल में मोबाइल इस्तेमाल से आंखों पर पड़ रहे असर से नेत्र रोग विशेषज्ञ की ओपीडी बढ़ गई है वहीं बच्चों में नींद की कमी के मामले बढ़ने से मनोरोग की ओपीडी भी बढ़ी है। जिला नागरिक अस्पताल में मनोरोग काउंसलर विनोद ने बताया कि पहले बच्चों के मामले कम आते थे लेकिन पिछले कुछ समय से बच्चों के मामले बढ़ गए हैं। बच्चों का मोबाइल का ज्यादा प्रयोग करने से उनकी मानसिक स्थिति और आंखों पर असर पड़ रहा है जिससे बच्चों में नींद की समस्या पैदा हो रही है। बच्चे स्कूल में जाने से पहले, स्कूल से आते ही, खाना खाते समय, घर से बाहर न खेलकर सिर्फ मोबाइल से चिपके रहना ज्यादा हो गया है इससे बच्चों की नींद भी प्रभावित हो रही है। नींद पूरी न होने से बच्चों का मानसिक संतुलन बिगड़ रहा है, वे पढ़ाई को कम महत्व दे रहे हैं, इससे उनका पारिवारिक मेल-जोल कम हो रहा है, सबसे जरूरी उनकी सोचने-समझने की क्षमता प्रभावित हो रही है। इसलिए माता-पिता को चाहिए कि वे बच्चे के साथ समय व्यतीत करे और उन्हें मोबाइल से दूरी बनाकर रखने के लिए समझाएं।
मोबाइल की लत लगने के कारण छोड़ दी थी कोचिंग -
शहर में रह रहे एक 20 वर्षीय युवा के पिता ने बताया कि उनका बेटा छह महीने पहले आईसीएस कोचिंग सेंटर पर अपने आने वाली नीट की परीक्षा के लिए कोचिंग लेता था। सेंटर पर बने नए दोस्तों की संगत में रहकर वह भी पहले की अपेक्षा मोबाइल ज्यादा देखने लग गया। धीरे-धीरे उसका फॉरन मूवीज देखने का रुझान इतना बढ़ गया की उसने कोचिंग सेंटर पर जाना बंद कर दिया था। जब भी उसे मोबाइल से दूर रहने और पढ़ने के लिए कहते तो उसे बेचैनी होने लगती थी मानो उसका मोबाइल के बिना दम घुट रहा हो। उसकी मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं रहती थी और आंखें में कमजोर हो गई थी। पहले उसे चश्मा नहीं लगा था लेकिन जब से मोबाइल देखने लगा तब से आंखें की समस्या उसकी बढ़ गई थी तो करीब तीन महीना पहले उसे चश्मा लगा है और करीब दो महीने पहले किसी की सलाह पर मैं उसे जिला नागरिक अस्पताल में मनोचिकित्सक के पास लेकर गया वहां उन्होंने उसकी काउंसलिंग की और उसका दवा शुरू की। अब फिर से उसका लगाव पढ़ाई की तरफ बढ़ने लगा है और मोबाइल का इस्तेमाल बंद कर दिया है।
माता-पिता को बच्चों के साथ दिन में कुछ समय अवश्य व्यतीत करना चाहिए और उनका मार्गदर्शन करना चाहिए। उन्हें मोबाइल के प्रयोग व दुरुपयोग के बारे में समझाना चाहिए। यदि बच्चा माता-पिता की नहीं मान रहा है और उनमें कुछ भी मानसिक रोग के लक्षण दिखते हैं तो तभी चिकित्सक से संपर्क करना चाहिए।
डॉ. मोना नागपाल, मनोरोग विशेषज्ञ जिला नागरिक अस्पताल।