पानीपत। रामनगर की बबीता और उनके पति एक समय मेहनत मजदूरी कर परिवार के लिए मुश्किल से दो समय की रोटी का जुगाड़ कर पाते थे। बच्चों की पढ़ाई का खर्च और अन्य चुनौती बनकर खड़े थे। उन्होंने हालत से समझौता करने के बजाय इनका सामना किया और क्रांति नाम से स्वयं सहायता समूह बनाया। बबीता जब समूह से जुड़ी तो हर कोई उनको टोक रहा था। उन्होंने किसी की प्रवाह नहीं की और अपना लक्ष्य साधकर आगे बढ़ने लगी।
रामनगर की बबीता ने बताया कि उन्होंने 2009 में स्वयं सहायता समूह बनाया। इसका नाम भी क्रांति महिला स्वयं सहायता समूह रखा। यह 10 महिलाओं का एक समूह है। उन्होंने हाथ से बैग बनाने के अपने गुण को मशीन की मदद से मजबूत करने का फैसला लिया। लोन लेकर एक मशीन घर में लगाई। पहले वह इस मशीन को चलाती थी। फिर काम बढ़ने लगा तो पहले पति और फिर बेटा भी हाथ बंटाने लगे। वह ज्यादातर मेलों में स्टॉल लगाकर बैग बेचती हैं। पिछले महीने ही हरिद्वार में स्टॉल लगाया था। वहां उनकी अच्छी आय हुई थी। वह मेले में 100 से 150 बैग बेच देती हैं। बबीता ने बताया कि समूह से जुड़ने के बाद उनकी स्वयं की पहचान बनने लगी है। संवाद