पानीपत। सुताना गांव की आशी देवी ने अपने जीवन में न कभी दवा खाई न ही अस्पताल गईं। सोमवार को दिल का दौरा पड़ने पर 103 वर्ष की आयु में उन्होंने दुनिया छोड़ दी। परिवार वालों का दावा है कि वह हमेशा देसी इलाज पर ही जोर देती थीं। वे अपने पीछे तीन बेटे और तीन बेटी समेत भरा पूरा परिवार छोड़ गईं हैं। दिल का दौरा पड़ने पर उन्हें पहली और आखिरी बार अस्पताल ले जाया गया था।
आशी देवी के बड़े बेटे कर्ण सिंह ने बताया कि उनकी माता को 12 जनवरी को ह्रदयाघात हुआ। वे उनको शहर के एक अस्पताल में ले गए। चिकित्सकों ने उनको मृत घोषित कर दिया। परिवार ने उनको 13 जनवरी को अंतिम विदाई दी। माता को इस उम्र में भी आंखों से स्पष्ट दिखाई देता था और याददाश्त भी भरपूर थी। वे हमेशा साधारण खाना पसंद करती थी और ग्रामीण जीवनशैली में रहना पसंद था। वे खांसी या बुखार होने की स्थिति में देसी उपचार लेती थी। इसमें काढा या अन्य चीजों काे प्रयोग में लाती थी।
पति की मौत के बाद परिवार को संभाला
कर्ण सिंह ने बताया कि उनके पिता का निधन 1982 में हो गया था। उनकी मां ने परिवार को संभाला। उ घर से लेकर खेत तक काम किया। तीनों बेटों कर्ण सिंह, बलबीर सिंह और राजपाल सिंह का पालन किया। उनके एक पौत्र सुशील कुमार हरियाणा सिविल सर्विस (एचसीएस) में हैं और वर्तमान में यमुनानगर में जिला परिषद के कार्यकारी अधिकारी हैं।
लोग सलाह लेने आते थे
सुताना गांव के पूर्व सरपंच रामफल ने बताया कि आशी देवी के पास गांव की महिलाएं सलाह लेने आती थी। गांव के 75 वर्षीय नकलीराम ने बताया कि आशी देवी उनसे उम्र में काफी बड़ी थी। वे उनको शुरू से ही स्वस्थ देखते आ रहे थे। वे दूसरे लोगों को भी अस्पताल से दूर रहकर देसी उपचार की सलाह देती थी।