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दृष्टिकोण बदलते ही जीवन की बदल जाती है दिशा : अरुणचंद्र मुनिराज

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पानीपत। अग्रवाल मंडी स्थित जैन स्थानक में गुरुदेव अरुणचंद्र मुनिराज, अभिषेक मुनि, अभिनंदन मुनि और अमृत मुनि महाराज का प्रवचन हुआ। प्रवचन सुनने के लिए जैन समाज के सैंकड़ों श्रावक पहुंचे। इस दौरान अरुणचंद्र मुनिराज ने कहा कि दृष्टिकोण बदलते ही जीवन की बदल दिशा जाती है।
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अरुण मुनि ने कहा कि जिस संसार में हम रहते हैं। वहां दुख का कारण बाहर नहीं, भीतर है। अज्ञान में डूबे प्राणी दुख से त्रस्त हैं और वे समाधान को संसार में खोजते हैं। मुनि बनकर, श्रावक बनकर, पूजा-पाठ, मंत्र-जाप, अनुष्ठानों में मन की संतुष्टि नहीं मिलती। इसका कारण स्पष्ट है विचारधारा नहीं बदली। भगवान महावीर कहते है कि जैसे ही दृष्टिकोण बदला वैसे ही जीवन की दिशा बदल गई। संसार में चाहे राजा हो, संत हो, महंत हो, या करोड़ों का मालिक कोई भी नहीं कह सकता कि मुझे जीवन में सब कुछ मनचाहा मिला। क्योंकि यह संसार ही ऐसा है जहां हर क्षण परिवर्तन है, अनिश्चितता है।
महावीर की पाठशाला सिखाती है यह केवल धार्मिक कर्मकांड नहीं, यह जीवन के गूढ़ रहस्यों की प्रयोगशाला है। मन को बदलो, तभी जीवन बदलेगा।
जितना व्यक्ति राग-द्वेष में रहेगा उतना ही दुख का शिकार रहेगा। मन के बोझ को कम करो, मां पर नहीं, मन पर बोझ है। जब मन खाली होगा तो जीवन हल्का हो जाएगा। राम को वनवास, कृष्ण को युद्ध और छल-प्रपंच और महावीर को दुखों की पराकाष्ठा मिली। सांप ने काटा, पैरों में अग्नि जलाई गई, देवताओं ने परीक्षा ली लेकिन वे नहीं टूटे क्योंकि उन्होंने विचारों को बदला। उन्होंने मन की अपेक्षाओं से ऊपर उठकर आत्मा की गहराइयों को पहचाना।
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