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सच्चा वैष्णव दुख और सुख दोनों परिस्थिति में समान रहता है : देवी चित्रलेखा

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कार्यक्रम में राधा-कृष्ण स्वरूप के साथ श्रद्धालु। संवाद
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समालखा। सुख में मनुष्य सरकती रेती जैसा बन जाता है, समय कब बीत गया पता ही न चला और दुख में मनुष्य के हृदय में कांटा जैसा चुभता है, लेकिन दोनों ही स्थिति में वैष्णव को स्थिर रहना चाहिए। उक्त उद्गार देवी चित्रलेखा ने शुक्रवार को नई अनाज मंडी में श्री शाम बाबा सेवा मंडल की ओर से आयोजित की जा रही भागवत कथा के व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि जीवन में कई बार बहुत सारी ऐसी बातें होती हैं जो हमें अच्छी नहीं लगती हैं लेकिन तब भी ये विश्वास रखना चाहिए कि भगवान जो करे सो भली करे। जिस प्रकार मां बाप अपनी संतान की रक्षा करते हैं उसी प्रकार अपने भक्तों की रक्षा भी भगवान करते हैं।
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कथावाचक चित्रलेखा ने भगवान के 16,108 विवाह का वर्णन करते हुए बताया कि भगवान की आठ मुख्य पटरानियां हैं। एक भौमासुर नामक दैत्य एक लाख कन्याओं के साथ विवाह करने के उद्देश्य से उन्हें बंदी बनाकर रख रहा था। तब उन कन्याओं के जीवन की रक्षा के लिए भगवान ने उस दैत्य का संहार किया और उन कन्याओं को कैद से बचाया पर जब कन्याओं ने कहा कि इतने वक्त परिवार से दूर रहने के बाद उन्हें कौन स्वीकार करेगा तो उन्हें इस लांछन से बचाने के लिए भगवान ने उन 16,100 कन्याओं से विवाह किया। सुखदेव ने सुदामा कथा का वर्णन किया। कथा के बाद फूल होली का उत्सव हुआ। कार्यक्रम में राधा-कृष्ण स्वरूप की झांकी निकाली गई इसमें श्रद्धालुओं ने नृत्य किया और महाआरती कर सभी को प्रसाद वितरित किया गया। इस अवसर पर सत्यवीर गुप्ता, प्रदीप बंसल, रमेश अग्रवाल, नवीन बंसल, संदीप व राकेश बंसल उपस्थित रहे।
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