नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनसीटी) ने रिफाइनरी पर सख्त रवैया अपनाते हुए 25 करोड़ रुपये का हर्जाना लगाया है। यह हर्जाना रिफाइनरी को एक माह में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और प्रशासन को जमा करना होगा। एनजीटी ने प्रशासन को सख्त निर्देश दिया है कि पर्यावरण को बचाने के लिए रिफाइनरी से सभी नियमों का पालन कराएं। संयुक्त कमेटी ने रिफाइनरी पर 642.18 करोड़ रुपये हर्जाने की अनंशुसा की है, जिस पर फिलहाल 25 करोड़ का हर्जाना लगाकर जमा कराने का आदेश दिया गया है, आगे की सुनवाई 17 फरवरी 2021 को होगी, तब और हर्जाना लगाया जा सकता है। एनजीटी रिफाइनरी की कार्यप्रणाली से बिल्कुल संतुष्ट नहीं नजर आई। इससे पहले भी रिफाइनरी पर 17.31 करोड़ रुपये हर्जाना लगाया जा चुका है। इसे रिफाइनरी जमा भी करवा चुका है।
कमेटी जांच में रिफाइनरी को पा चुकी है दोषी
नेशनल ग्रीन ट्रिब्युनल की स्पेशल ज्वाइंट एक्शन कमेटी ने अपनी दूसरी बार की जांच में पानीपत रिफाइनरी को पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने का दोषी पाया है। वहीं रिफाइनरी पर गांव सिंहपुरा, न्यू बोहली, ददलाना, रेर कलां, फरीदपुर समेत रिफाइनरी के आस पास के क्षेत्र में भूजल को खराब करने और रिफाइनरी से निकलने वाली खतरनाक गैस से लोगों का स्वास्थ्य खराब करने के आरोप को सही पाया। इधर, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल की स्पेशल ज्वाइंट एक्शन कमेटी ने अपनी जांच रिपोर्ट में पानीपत रिफाइनरी पर 642.18 करोड़ रुपये हर्जाना लगाने की अनुशंसा की है। इसी अनुशंसा पर हर्जाने की पहली किश्त 25 करोड़ रुपये तय की गई है। कुल कितना रिफाइनरी से हर्जाना कितना वसूला जाना है, इस पर अंतिम निर्णय ग्रीन ट्रिब्यूनल लेगा। विश्व विख्यात टेक्सटाइल सिटी पानीपत देश का 11वां व हरियाणा का दूसरा सबसे प्रदूषित जिला है। प्रदूषण फैलाने के लिए रिफाइनरी प्रशासन पर अनेक बार आरोप लगे, वहीं रिफाइनरी प्रशासन हर बाद अपने उपर लगे प्रदूषण फैलने के आरोप को निराधार बताया है।
10 किलोमीटर क्षेत्र के भूजल की हुई जांच
प्रदूषण से बेहाल हो चुके आसपास के गांवों में पानीपत रिफाइनरी के प्रति जनता में नाराजगी बढ़ती चली गई। 2018 में रिफाइनरी के पास स्थित गांव सिठाना के सरपंच सत्यपाल ने पानीपत रिफाइनरी से फैल रहे प्रदूषण, पानीपत प्रशासन की रिफाइनरी के प्रति चुप्पी की शिकायत नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल में शिकायत की। ट्रिब्यूनल ने पानीपत रिफाइनरी में वायु और जल प्रदूषण फैलाने के मामले की जांच के लिए स्पेशल ज्वाइंट एक्शन कमेटी का गठन किया था। कमेटी की जांच में तत्कालीन उपायुक्त सुमेधा कटारिया ने मनमानी की थी, इसके चलते ट्रिब्यूनल ने फिर से जांच के आदेश दिए थे। वहीं जांच कमेटी में सीएसआईआर नीरी, केंद्रीय भूजल बोर्ड और डीसी पानीपत की जांच कमेटी को शामिल किया गया था। कमेटी ने जांच में पानीपत रिफाइनरी को वायु और जल प्रदूषण फैलाने की दोषी पाया था, वहीं कमेटी ने रिफाइनरी और इसके 10 किमी के आसपास के क्षेत्र में भूजल की जांच कराई। यहां से 31 सैंपल भरे गए।
रिफाइनरी के आसपास पीएच 7.15 से 8.24 मिला
लैब से जांच रिपोर्ट चिंताजनक मिली। रिफाइनरी और इसके आसपास का पीएच 7.15 से 8.24 मिला। क्लोराइड 250 एमजी से नीचे मिला। खंडरा गांव के सरकारी स्कूल से लिए पानी के सैंपल में फ्लोराइड 0.36 एमजी प्रति लीटर मिला। इधर, सीएसआईआर-नीरी (जल की गुणवत्ता नापने वाली केंद्रीय एजेंसी), केंद्रीय भूजल बोर्ड और डीसी पानीपत की जांच कमेटी ने पानीपत रिफाइनरी पर ऑक्सीजन में आई कमी एवं अवैध रूप से केमिकल युक्त पानी बहाने पर भूजल के दूषित होने पर क्षतिपूर्ति 26.90 करोड़ रुपये, नागरिकों के स्वास्थ्य एवं पर्यावरण की क्षतिपूर्ति 92.59 करोड़ रुपये, भूजल को हुए नुकसान की क्षतिपूर्ति 540 करोड़ रुपये कुल 659.49 करोड़ रुपये का हर्जाने की अनुशंसा की है, जबकि वहीं पानीपत रिफाइनरी ने कमेटी की रिपोर्ट पर ग्रीन ट्रिब्यूनल में 17.31 करोड़ का हर्जाना जमा किया था। कमेटी ने रिफाइनरी को 642.18 करोड़ रुपये का हर्जाना करने की अनुशंसा की है।