अमर उजाला ब्यूरो
पानीपत। बारिश आते ही मलेरिया का डंक अपना असर दिखाने लगा है। सिविल अस्पताल में मलेरिया और टायफाइड के मरीज बढ़ने लगे हैं। गांव काबड़ी में रहस्यमयी बुखार से पांच साल की बच्ची की मौत हो चुकी है। मलेरिया, टायफाइड और मच्छर जनित अन्य रोगों से पीड़ित मरीजों की हर रोज बढ़ रही है। इसके बावजूद स्वास्थ्य विभाग बेखबर है। पिछले दिनों प्री-मानसून की बारिश के बाद सिविल अस्पताल में एकाएक मलेरिया और टायफाइड के मरीज आने लगे थे। बावजूद इसके स्वास्थ्य विभाग ने न तो अभी तक कहीं पर फॉगिंग करवाई गई है, न ही मरीजों की बढ़ती संख्या को देखते हुए मलेरिया और टायफाइड पर कंट्रोल करने के ठोस प्रयास किए हैं। इसके पीछे सिविल अस्पताल में संसाधनों का अभाव होना भी एक कारण माना जा रहा है। हालांकि, स्वास्थ्य अधिकारी मलेरिया और टायइफाइड जैसी खतरनाक बीमारियों के अंकुश में होने की बात कह रहे हैं।
सिविल अस्पताल में करीब पांच सौ से आठ सौ मरीज ओपीडी में आ रहे हैं। इनमें ज्यादातर मरीज बुखार से पीड़ित होते हैं। इनकी संख्या में प्रतिदिन इजाफा हो रहा है। सिविल अस्पताल के अलावा निजी अस्पतालों में भी मलेरिया और टायफाइड के मरीज आने लगे हैं।
बाहरी क्षेत्रों में मच्छरों की भरमार
पिछले पांच दिनों से जारी बारिश के बाद शहरी की बाहरी कॉलोनियों में मच्छरों की भरमार हो गई है। इससे कॉलोनियों में मच्छरजनित रोगों के फैलने की आशंका बढ़ गई है। कॉलोनीवासियों का कहना है कि मच्छरों की भरमार के बावजूद स्वास्थ्य विभाग ने अभी तक किसी भी कॉलोनी में फॉगिंग नहीं करवाई है। कॉलोनीवासियों ने मांग की है कि क्षेत्र में जल्द से जल्द फॉगिंग करवाई जाए। मच्छरजनित रोगों के फैलने से पहले ही अंकुश लगाया जा सके।
कब होता है मलेरिया
विशेषज्ञों की मानें तो अधिकांश मलेरिया तब होता है, जब मौसम न तो ज्यादा गर्म होता है और न ही ज्यादा ठंडा। यानी तापमान जब 25 से 35 डिग्री के बीच रहता है और हवा में आर्द्रता बनी रहती है। ऐसे मौसम में मच्छरों की भरमार होती है। वे काटने के बाद रक्त में विषाणु छोड़ देते हैं। इससे मलेरिया, डेंगू और अन्य बीमारियां फैलती हैं। मलेरिया होने पर शरीर में लाल रक्त कणिकाएं नष्ट होने लगती हैं, जिससे व्यक्ति को तेज बुखार हो जाता है और कंपकंपी छूटने लगती है। ऐसी दशा में अगर मरीज को जल्द अच्छे डॉक्टर के पास न ले जाया जाए तो जान जाने का भी खतरा बना रहता है।
इन बातों का रखें ध्यान
मलेरिया एक खतरनाक बीमारी है। प्लाज्मोडियम फाल्सीपेरम परजीवी मलेरिया का सबसे खतरनाक जीवाणु है। इस परजीवी से न सिर्फ घातक बीमारियां होती हैं, बल्कि मौत का खतरा भी सदैव बना रहता है।
मलेरिया के दौरान ठीक प्रकार से संतुलित आहार न लेना या निगेटिव इफेक्ट वाली चीजों का सेवन भी बीमारी को बढ़ाता है।
मलेरिया के रोगी को कॉफी, कड़क चाय, आचार, नशीली चीजों का सेवन, मांस, शराब, तले पदार्थ, जंकफूड, वसायुक्त चीजें, तेज मसाला, डिब्बा बंद फूड व फल, चॉकलेट, ठंडे पानी से परहेज करना चाहिए।
मानसून के साथ ही मलेरिया अपने पैर पसारने लगता है। इसलिए इस मौसम में अपने आस-पास के वातावरण में साफ-सफाई रखनी चाहिए।
घरों में कूलर, टायरों और अन्य स्थानों पर पानी जमा होने, जगह-जगह गंदगी हेाने, टंकी ढकी न होने, एयरकंडीशनर को साफ और सूखा न रखने से भी मलेरिया फैलने का खतरा बना रहता है।
मलेरिया पर एक नजर
वर्ष मलेरिया के केस
2005 7303
2006 8157
2007 1549
2008 1130
2009 862
2010 399
2011 535
2012 850
2013 626
2014 539 लगभग
2015 316 लगभग
2016 126
2017 08 (जून 2017 तक)
ऐसे मौसम में मच्छरों की भरमार हो जाती है। बारिश के कारण जगह-जगह पानी जमा होने से मच्छरों का लार्वा पनपता है। इसलिए अपने आस-पास के क्षेत्र को साफ-सुथरा रखना चाहिए और दूसरे लोगों को भी इसके लिए प्रेरित करना चाहिए। जिले में मच्छर जनित रोगों पर अभी तक पूरी तरह कंट्रोल है। फॉगिंग के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में सरपंचों की ड्यूटियां लगाई हुई है और शहरी क्षेत्र में नगर-निगम कर्मचारी प्रभावित एरिया में फोगिंग कर रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग मच्छर जनित रोगों को लेकर गंभीर है। यही कारण है कि गत वर्षों की तुलना में मलेरिया के केस बहुत कम मिले हैं।
डॉ. संतलाल वर्मा, सिविल सर्जन, पानीपत।