पंचकूला। मतगणना के दौरान सामने आए आंकड़े स्पष्ट कर रहे हैं कि पंचकूला निकाय चुनाव किसान आंदोलन से अछूता नहीं रहा। शहर में किसानों की संख्या जितनी कम है, ग्रामीण क्षेत्रों में उतनी ही ज्यादा है। यही कारण है कि भाजपा के मेयर प्रत्याशी कुलभूषण गोयल पर वार्ड नंबर-17, 18, 19 और 20 के मतदाताओं ने बहुत ज्यादा विश्वास नहीं जताया। यदि ऐसा न होता तो हरियाणा विधानसभा अध्यक्ष ज्ञानचंद गुप्ता का दावा सत्य साबित होता। उन्होंने मतदान के अगले दिन मेयर सहित वार्ड पार्षदों के साथ जिला भाजपा कार्यालय में समीक्षा बैठक कर दावा किया था कि मेयर पद के प्रत्याशी कुलभूषण गोयल 10 से 12 हजार वोटों से विजयी होंगे। लेकिन वह 10 हजार का आंकड़े के करीब भी नहीं पहुंच पाए।
भाजपा के मेयर पद के प्रत्याशी कुलभूषण गोयल ने मतगणना के दौरान तीसरे चरण से लेकर 14वें तक लगातार बढ़त बनाए रखी, लेकिन जैसे ही 15वें चरण की गिनती शुरू होते ही उलटी गिनती शुरू हो गई और जीत का अंतर कम होने लगा। कुलभूषण गोयल ने 16वें राउंड में पांच हजार का आंकड़ा पार कर लिया, लेकिन 17वें राउंड में एक बार फिर कांग्रेस प्रत्याशी उपिंदर आहलूवालिया ने बढ़त बना ली। हालांकि वह ज्यादा देर तक टिक नहीं पाईं और 18वें राउंड में कुलभूषण गोयल ने नुकसान की भरपाई कर ली। 21वें राउंड के बाद कांग्रेस प्रत्याशी ने भाजपा प्रत्याशी को हराने की पूरी कोशिश की, लेकिन वह 2057 मतों से विजयी रहे।
रंजीता-अनिल का पार्टी छोड़ना पड़ा भारी
वरिष्ठ नेता रंजीता मेहता और अनिल पंगोत्रा का पार्टी को छोड़ना कांग्रेस को भारी पड़ गया। भले ही मतदान से दो दिन पहले रंजीता मेहता ने भाजपा का दामन थामा लेकिन उन्होंने कांग्रेस को काफी नुकसान पहुंचाया। उनके भाजपा में आने से पंजाबी मतदाताओं ने एक तरफा भाजपा को समर्थन दे दिया। वहीं, बसपा से मेयर पद के प्रत्याशी अनिल पंगोत्रा भी टिकट न मिलने से नाराज होकर कांग्रेस को छोड़ गए थे। जिन्हें निकाय चुनाव में 2378 वोट हासिल हुए हैं। यदि यही वोट कांग्रेस के खाते में जाते तो मेयर पद की उम्मीदवार उपिंदर आहलूवालिया को हार का सामना न करना पड़ता है। इतना ही नहीं जिला यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष मुकेश सिरसवाल और वरिष्ठ नेता अनिल चौहान ने भी पार्टी प्रत्याशी को अंदर खाते नुकसान पहुंचाया है। राजनीतिक विशेषज्ञ तो यहां तक कह रहे हैं कि यदि कांग्रेस प्रत्याशी को नोटा का ही मत मिल जाता तो वह जीत सकती थीं।
भीतरघात और गुटबाजी का शिकार हुई कांग्रेस
निकाय चुनाव में कांग्रेस एक बार फिर भीरतघात और गुटबाजी का शिकार हुई है। यदि ऐसा न होता तो कांग्रेस की जीत सुनिश्चित थी। निकाय चुनाव जीतने के लिए कांग्रेस के दिग्गजों ने दिन-रात एक कर दी। लेकिन कुछ ऐसे भी पार्टी के नेता थे तो अंदरखाते कांग्रेस की मेयर पद की प्रत्याशी को हराने में लगे हुए थे। वह सारा दिन प्रचार तो करते थे लेकिन अंदर से नुकसान पहुंचा रहे थे। वहीं, एक कार्यक्रम में तो विरोध साफ दिखाई दिया। राष्ट्रीय स्तर के नेता ने जनसभा को संबोधित किया, लेकिन मंच पर लगे पोस्टर में मेयर प्रत्याशी की फोटो ही गायब थी।
प्रचार से थे दूर, जीतते ही दिखाई दिए
ऐसा नहीं है कि निकाय चुनाव में भाजपा को उनके ही पार्टी के पदाधिकारियों ने नुकसान पहुंचाने की कोशिश नहीं की, लेकिन वह अपने मकसद में सफल नहीं हो पाए। मेयर पद की टिकट न मिलने से कई पदाधिकारियों में नाराजगी साफ देखी गई। हरियाणा विधानसभा अध्यक्ष ज्ञानचंद गुप्ता ने कुछ लोगों को तो मना लिया, लेकिन कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने प्रचार के दौरान दूरी बनाए रखी। लेकिन जैसे ही कुलभूषण गोयल ने मेयर की सीट जीती वे गिले सिकवे भुलाकर जीत के जश्न में शामिल हो गए। इससे पहले नाराज चल रहे नेताओं की गुप्त मीटिंगों का दौर लगातार जारी था।