चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ के जिला एवं उपमंडल न्यायालयों में दिव्यांग व्यक्तियों के अधिकार अधिनियम, 2016 के अनुसार न्यूनतम अपेक्षित बुनियादी ढांचा उपलब्ध करवाने को लेकर संज्ञान मामले में हरियाणा व पंजाब से स्टेटस रिपोर्ट मांगी है। कोर्ट ने इन सुविधाओं को उपलब्ध करवाने के लिए उठाए गए कदमों का ब्योरा सौंपने का आदेश दिया है।
पंजाब के मालेरकोटला जिला न्यायालय में 60 वर्षीय एक दिव्यांग महिला ने अपना मामला प्रथम तल से भूतल पर स्थानांतरित करने की मांग की थी क्योंकि न्यायिक परिसर में दिव्यांग व्यक्ति के लिए न्यायालय की कार्यवाही में भाग लेने के लिए रैंप या लिफ्ट की कोई व्यवस्था नहीं थी।
उसकी दुर्दशा पर ध्यान देते हुए जस्टिस हरप्रीत सिंह बराड़ ने कहा था संविधान के अनुच्छेद 21 में निहित जीवन का अधिकार केवल पशु-समान अस्तित्व तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें सही अर्थों में गरिमा के साथ सार्थक जीवन जीने का अधिकार भी शामिल है। सार्वजनिक भवनों, विशेष रूप से न्यायिक परिसरों में उचित सुविधाओं का अभाव न्याय तक पहुंच से वंचित करने के बराबर है और दिव्यांग व्यक्तियों के साथ भेदभाव के बराबर है।
हाईकोर्ट ने कहा था कि राज्य का दायित्व है कि वह अपने नागरिकों को संविधान द्वारा गारंटीकृत मौलिक अधिकारों को प्राप्त करने के लिए समान अवसर प्रदान करे और सभी आवश्यक सुविधाएं प्रदान करे जिसमें भारत के क्षेत्र में स्वतंत्र रूप से घूमने का अधिकार भी शामिल है। इस मामले का दायरा बढ़ाते हुए हाईकोर्ट ने हरियाणा, पंजाब व चंडीगढ़ की सभी अदालतों को शामिल कर लिया था।