चंडीगढ़। सेक्टर-7 के स्पोर्ट्स काम्प्लेक्स में रविवार को पीजीआई रोटो ट्रांसप्लांट गेम्स का आयोजन किया गया। इस प्रतियोगिता में 15 राज्यों के प्रतिभागियों ने विभिन्न खेलों में हिस्सा लिया।
ऑर्गन ट्रांसप्लांट ट्रस्ट, रोटो, नॉर्थ, इंडियन सोसाइटी ऑफ ट्रांसप्लांट सर्जंस और ऑर्गन इंडिया के संयुक्त प्रयास से आयोजित इस प्रतियोगिता में 300 से अधिक अंग प्रत्यारोपण प्राप्तकर्ताओं और अंगदाताओं ने भाग लिया। प्रतियोगिता में दौड़, बैडमिंटन, भाला फेंक, रेस-वाक और रस्साकशी जैसे खेलों में ट्रांसप्लांट खिलाड़ियों ने जबरदस्त जज्बा दिखाया। ये खिलाड़ी कभी जीवन-मृत्यु के संघर्ष से जूझ रहे थे, लेकिन आज खेल के मैदान पर मेडल जीतने की कोशिश करते हुए जी जान से नजर आए।
भारत के पूर्व हाॅकी कप्तान राजपाल सिंह इस आयोजन के मुख्य अतिथि थे। उन्होंने अंगदान की रिले रेस से तुलना करते हुए कहा कि जिस तरह एक धावक जीत की मंजिल के लिए आगे बढ़ाता है, उसी तरह अंगदान से जीवन की मशाल जलती रहती है। कार्यक्रम में नोटो के निदेशक डाॅ. अनिल कुमार ने कहा कि यह केवल एक खेल प्रतियोगिता नहीं, बल्कि अंगदान जागरूकता को बढ़ावा देने वाला आंदोलन है। उन्होंने राष्ट्रीय अंग प्रत्यारोपण कार्यक्रम के तहत मृत देहदान को मजबूत करने की जरूरत पर जोर दिया। प्रो. मुक्त मिंज, पूर्व प्रमुख, किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी विभाग ने बताया कि जहां भारत में मृत अंगदान की दर सिर्फ 1 प्रति दस लाख है, वहीं चंडीगढ़ अंतरराष्ट्रीय स्तर के आंकड़े को छू रहा है।
कभी उम्मीद मत छोड़ो, आत्मविश्वास ही सबसे बड़ा हथियार
प्रतियोगिता में बिहार, हिमाचल, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, मणिपुर, असम, झारखंड और ओडिशा समेत 15 राज्यों के प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। कार्यक्रम के समापन पर प्रो. आशीष शर्मा, प्रमुख, किडनी ट्रांसप्लांट सर्जरी विभाग ने कहा कि ट्रांसप्लांट गेम्स का मकसद यह दिखाना है कि प्रत्यारोपण केवल एक चिकित्सा प्रक्रिया नहीं, बल्कि नई जिंदगी की शुरुआत है। किडनी ट्रांसप्लांट प्राप्तकर्ता दिग्विजय सिंह, जो अब वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स के सिल्वर मेडलिस्ट बॉडी बिल्डर हैं, ने अपनी कहानी साझा करते हुए कहा कि कभी उम्मीद मत छोड़ो, आत्मविश्वास ही सबसे बड़ा हथियार है। दिल्ली की प्रीति, जिनका 25 साल पहले हार्ट ट्रांसप्लांट हुआ था, ने बैडमिंटन में सिल्वर मेडल जीतकर दिखाया।