चंडीगढ़। किसी अपराधी को सुधारने और उसकी जीवन में रुचि बनी रहे इसके लिए उसे पैरोल के माध्यम से समाज से जोड़े रखना जरूरी है। एक से अधिक मामला दर्ज होने और रिहाई पर अपराध करने की केवल संभावना के आधार पर पैरोल से इन्कार नहीं किया जा सकता। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने यह अहम टिप्पणी करते हुए कुलविंदर सिंह उर्फ तैना की पैरोल निवेदन खारिज करने के आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट ने फिरोजपुर के डीएम को चार सप्ताह के भीतर पैरोल निवेदन पर फिर से निर्णय लेने का आदेश दिया है। अपने आदेश में हाईकोर्ट ने कहा कि पैरोल का उद्देश्य अपराधी का पुनर्वास और उसके परिवार, दोस्तों और समुदाय के साथ निरंतरता बनाए रखना है। इसके साथ ही पैरोल के जरिये कैदी को निरंतर कैदी जीवन के हानिकारक प्रभावों से बचाया जा सकता है। पैरोल कैदी में आत्मविश्वास की भावना विकसित करती है और उसे अहसास दिलाती है कि जेल से परे बेहतर जीवन है। ऐसे में किसी कैदी को दोषी ठहराने के बाद जेल में कैद रहने के दौरान वह पैरोल पर अस्थायी रिहाई का हकदार है, हालांकि यह एक रियायत है, अधिकार नहीं। कैदी के खिलाफ विभिन्न मामलों का दर्ज होना पैरोल से इन्कार करने का पर्याप्त आधार नहीं है। केवल इस आशंका के आधार पर कि कैदी बाहर जाने के बाद अपराध में लिप्त हो सकता है पैरोल से इन्कार नहीं किया जा सकता। इन्कार करने के लिए पुख्ता सामग्री होनी चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह फैसला फिरोजपुर के डीएम के आदेश के खिलाफ अपील पर सुनाया है। डीएम ने पैरोल पर कुलविंदर सिंह की रिहाई की स्थिति में नशे की बिक्री की संभावना के चलते उसे यह लाभ देने से इन्कार कर दिया था। याचिकाकर्ता एनडीपीएस के मामले में 11 साल के कठोर कारावास की सजा भुगत रहा है। हाईकोर्ट ने कहा कि इस प्रश्न पर विचार करना कि क्या याचिकाकर्ता को पैरोल पर रिहा करने से राज्य की सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के रखरखाव को खतरा हो सकता है, स्पष्ट रूप से सक्षम प्राधिकारी की ओर से नहीं किया गया।