जाट आरक्षण आंदोलन के मृतकों को शहीद बताते हुए अखिल भारतीय जाट आरक्षण संघर्ष समिति ने मृतक आश्रितों को मुआवजा और सरकारी नौकरी देने की मांग की है। संघर्ष समिति ने ऐसी 7 मांगों से संबंधित ज्ञापन सोमवार को प्रधानमंत्री के नाम सिटी मैजिस्ट्रेट को सौंपा। ज्ञापन देने से पूर्व समिति ने जाट सभा सेक्टर-6 में एक बैठक की।
यहां विचार विमर्श के बाद पांच सदस्यीय शिष्टमंडल ने सिटी मैजिस्ट्रेट ममता शर्मा को ज्ञापन सौंपा। शिष्टमंडल में अखिल भारतीय जाट महासभा पंचकूला के अध्यक्ष एवं संघर्ष समिति के सदस्य दिलबाग सिंह, आजाद मलिक, एडवोकेट अनिल कालीरमन, जसबीर सिंह और एडवोकेट सतीश कादियान शामिल थे।
दिलबाग सिंह ने बताया कि उनकी मांग है कि हरियाणा सरकार पहले अध्यादेश लाकर जाटों को पिछड़ा वर्ग की सूची में शामिल करे और इसके बाद विधानसभा में बिल लाकर हरियाणा के जाटों को आरक्षण दे। केंद्रीय स्तर पर जाटों को आरक्षण देने के लिए राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग संशोधन बिल लाकर बट सत्र में प्रदेश व केंद्र सरकार की ओबीसी सूचियों में व्याप्त विसंगतियों को दूर किया जाए। जाट आंदोलन के दौरान गोली चलवाने वाले दोषी अधिकारियों पर कार्रवाई हो।
आंदोलन के दौरान जिनकी मौत हुई है उन्हें शहीद बताते हुए आश्रितों को सरकारी नौकरी और मुआवजे दिया जाए। आंदोलन के दौरान जिन लोगों पर मामले दर्ज हुए हैं उन्हें वापस लिया जाए। कुरुक्षेत्र लोकसभा क्षेत्र के सांसद राज कुमार सैनी के खिलाफ गलत बयानबाजी के लिए सख्त कार्रवाई की जाए। दिलबाग सिंह बताया कि हरियाणा के प्रत्येक जिला मुख्यालय पर सोमवार को जाट आरक्षण संघर्ष समिति द्वारा अपनी मांगों को लेकर प्रधानमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपे गए हैं।
सरकार प्रायोजित था 35 बिरादरी बनाम जाट का मामला
संघर्ष समिति ने ज्ञापन में कहा है कि राज्य में 35 बिरादरी बनाम जाट का जो प्रचार किया गया वह प्रदेश सरकार और उसके मंत्रियों द्वारा प्रायोजित था। मांग ये भी कि गई है कि आंदोलन के दौरान जो हिंसा हुई उसके लिए सरकार जिम्मेदार है।
एसआईटी से नहीं है न्याय की अपेक्षा
संघर्ष समिति का आरोप है कि आंदोलन के दौरान जो हिंसा हुई उसकी जांच के लिए सरकार द्वारा बनाई गई एसआईटी एवं सरकार के जातिवादी अधिकारियों से जाट समाज को न्याय की कोई अपेक्षा नहीं है। इसलिए केंद्र सरकार एक न्यायिक जांच आयोग सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश की अध्यक्षता में बनाया जाए।