फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Panchkula News: आंखों के सामने आज भी घूमता है कारगिल युद्ध इसलिए मुशर्रफ के बुलाने पर भी नहीं गया पाकिस्तान

विज्ञापन
विज्ञापन
पूर्व सेना अध्यक्ष वीपी मलिक बोले, 1999 में पाकिस्तान को मुंहतोड़ दिया था जवाब, देशभक्ति से बढ़कर कोई सेवा नहींदीपक शाही
विज्ञापन

पंचकूला। करीब 76 साल पहले पाकिस्तान के डेरा इस्माइल खान से अपने परिवार के साथ कोलकाता पहुंचे। तब साढ़े सात साल के बच्चे को देश की आजादी का मतलब तक पता नहीं था। स्कूल में फौजियों के फिजिक और उन्हें मिलने वाले सम्मान को देखकर सेना से प्रभावित हुआ। महज 15 साल की उम्र में अपने मामा और पिता से प्रेरणा लेकर एनडीए ज्वाइन किया। तब जाकर देश की आजादी का मतलब समझ में आया। उसी दिन मन में ठान लिया कि भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव जैसे भारत माता के वीर सपूतों के बलिदान से मिली देश की आजादी को बचाने के लिए आजीवन तत्पर रहूंगा। इसका परिचय 1962 में चीन के खिलाफ हुए युद्ध में लद्दाख में बतौर कैप्टन सेना में अहम भूमिका निभाकर दिया और 1999 में हुए कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान को खदेड़ साबित कर दिखाया कि मन में देश भक्ति की निष्ठा हो तो दीवार बनकर खड़ी हर मुश्किलें अपने आप रास्ते बदल लेती हैं। यह देश का नायक कोई और नहीं पूर्व सेना अध्यक्ष जनरल वीपी मलिक हैं। जिन्हें सेना में योगदान के लिए अति विशिष्ट सेवा और परम विशिष्ट सेवा पदक से सम्मानित किया जा चुका है।

कारगिल युद्ध की जिम्मेदारी निभाना सबसे बड़ी खुशी का पल रहा
पंचकूला सेक्टर-6 निवासी जनरल वीपी मलिक ने बताया कि 1999 में कारगिल युद्ध की जिम्मेदारी की पूरी कमान उनके हाथों में थी। पाकिस्तानी सेना ने भारतीय सेना के सक्षम हाथ खड़े कर दिए और घुटने टेक दिए। एक फौजी के लिए इससे बड़ी खुशी की बात और क्या हो सकती है। कारगिल युद्ध में सफलता के बाद मेरे कार्यालय आकर देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री द्वारा बधाई देना और यह पूछना कि खाने पर घर कब बुलाओगे, यह मेरे लिए हर्ष की बात थी। वह घर भी आए और मुझे भी दावत पर बुलाया।
विज्ञापन


मुशर्रफ ने कई बार पाकिस्तान आने का न्योता भेजा, नहीं गया
जनरल वीपी मलिक ने बताया कि पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति स्व. परवेज मुशर्रफ ने कई बार पाकिस्तान आने का न्योता भेजा, लेकिन वहां नहीं गया। क्योंकि अपने देश के जवानों को अपनी आंखों के सामने शहीद होते देखा है। कारगिल युद्ध का दृश्य आज भी मेरे नजरों के सामने घुमता ह। आज भी सीने में वही उबाल है, तभी पाकिस्तान जाने की इच्छा भी नहीं हुई। बेशक मेरा जन्म वहां हुआ है। तब देश आजाद नहीं हुआ था। कभी वहां की याद भी नहीं आती। वहां होने वाले दंगाें से परेशान होकर परिवार ने कोलकाता कूच किया था। बाद में हम लोग दिल्ली में बस गए। ट्रेन में कई दिनों का सफर और परेशानी आज भी मेरे जेहन में है।

जीवन पर एक नजर
-जन्म 1 नवंबर 1939 को डेरा इस्माइल खान, उत्तर पश्चिम सीमांत प्रांत, ब्रिटिश भारत (अब खैबर पुख्तूनख्वा, पाकिस्तान)
- सेवा वर्ष- 7 जून 1959 से 30 सितंबर 2000 तक।
- थल सेना के चीफ (1997 से 2000), उप सेना प्रमुख (1996 से 1997)
- युद्ध और लड़ाइयां- कारगिल युद्ध ऑपरेशन कैक्टस
- इनाम- परम विशिष्ट सेवा पदक और अति विशिष्ट सेवा पदक

सवाल-जवाब
सवाल- देश आजाद हुआ तब आप कितने साल के थे? जवाब- महज आठ साल का था, तब चौथी कक्षा में पढ़ रहा था। उस समय देश की आजादी का मतलब भी पता नहीं था।
सवाल- सेना में शामिल होने का निर्णय कब लिया?
जवाब- 15 साल की उम्र में देश की आजादी का मतलब समझ में आया। उसी दिन देश की आजादी की रक्षा के लिए सेना में शामिल होने का फैसला किया। 1955 में एनडीए ज्वाइन किया और 1959 में सेना में शामिल हुआ।
विज्ञापन

सवाल- सेना में ज्वाइन करने की प्रेरणा कहां से मिली?
जवाब- स्कूल और सोसाइटी में फौजियों को मिलने वाले सम्मान, मामा व पिता से सेना में शामिल होने की प्रेरणा मिली। पिता और मामा दोनों सेना में थे।
सवाल- आपके जीवन में सबसे बड़ा खुशी का पल क्या था?
जवाब- कारगिल युद्ध के दौरान पाकिस्तान का भारत के समक्ष घुटने टेकना, सबसे बड़ा खुशी का पल था।
सवाल- 1999 से 2023 के बीच सेना में क्या बदलाव देखते हैं?
जवाब- 1999 में फौज के पास उतने हथियार और संसाधन नहीं थे। 24 साल बाद भारतीय फौज अच्छे हथियार, सर्विलांस, सैटेलाइट्स जैसे हाइटेक संसाधनों से लैस है। आज हमें दूसरों पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं है।
सवाल- भारत को किन क्षेत्रों में मजबूत होने की जरूरत है?
जवाब- इकोनॉमी के साथ साइंस और टेक्नालॉजी में मजबूत होने की जरूरत है। तभी हम चीन और पाकिस्तान जैसे देशों को मुंहतोड़ जवाब दे सकते हैं।
सवाल- आप सेना ज्वाइन नहीं करते तो क्या करते?
जवाब- इंजीनियर होता।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें