पंचकूला। पंचकूला की ममता ने पिछले साढ़े पांच वर्षों में अपनी जिंदगी की बागडोर खुद संभाली और ई-रिक्शा चलाकर बच्चों का पालन-पोषण कर रही हैं। शुरुआत में पति के जुआ, शराब और बुरी संगति के कारण घर की हालत बिगड़ गई और अंततः उन्होंने दूसरी शादी कर ममता और उनके बच्चों को अकेला छोड़ दिया।
ममता ने हार मानने के बजाय ठान लिया कि वह अपने दम पर बच्चों की परवरिश करेंगी। नौकरी की तलाश में कई असफल प्रयासों के बाद उन्होंने ई-रिक्शा चलाना सीखा और आज पंचकूला, चंडीगढ़, कालका और पिंजौर की सड़कों पर आत्मविश्वास के साथ काम कर रही हैं।
ममता कहती हैं कि पहले लोगों की नजरें और ताने परेशान करते थे लेकिन अब वही लोग उन्हें प्रेरणा मानते हैं। उनका सपना है कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर आत्मनिर्भर बनें और समाज में महिलाओं के सम्मान के लिए काम करें। आज ममता उन तमाम महिलाओं के लिए मिसाल हैं जो कठिन परिस्थितियों में भी अपने दम पर जीवन की नई शुरुआत करने का साहस रखती हैं।