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किडनी कांड: जांच कमेटी ने पीजीआई चंडीगढ़ को दी क्लीन चिट, अपनी रिपोर्ट में कई सुझाव भी दिए

Sat, 21 Sep 2019 12:46 PM IST
पंचकुला ब्‍यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
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मणिपुर से चंडीगढ़ में किडनी ट्रांसप्लांट के लिए लाई गई महिला के मामले में गठित कमेटी ने पीजीआई को क्लीन चिट दे दी है। कमेटी के मुताबिक इस मामले में पीजीआई का कोई रोल नहीं मिला है। मणिपुर के जिन लोगों के किडनी ट्रांसप्लांट पीजीआई में हुए हैं, उनमें शामिल डोनर और रिसीपीएंट के सभी कागजात को चेक किया गया, जो पूरी तरह से सही पाए गए हैं। डोनर को चेक करने का पीजीआई का जो तरीका है, वह भी मजबूत है। कमेटी ने अपनी रिपोर्ट पीजीआई डायरेक्टर को सौंप दी है। साथ ही कुछ सुझाव भी दिए हैं, जिन्हें पीजीआई जल्द ही लागू करेगा। इससे सिस्टम और मजबूत हो जाएगा।
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इसी महीने की शुरुआत में चंडीगढ़ पुलिस के हाथ मणिपुर की एक महिला लगी थी। जांच में पता चला है कि उस महिला का पीजीआई में किडनी ट्रांसप्लांट होना था, इसलिए उसे मणिपुर से यहां लाया गया था। यह भी बात उठी कि पीजीआई में पहले भी इस तरह के मामले हो चुके हैं। उसके बाद पीजीआई डायरेक्टर प्रो. जगतराम ने तीन सदस्यीय एक कमेटी गठित की। इसमें डीन रिसर्च प्रो. डा. अरविंद राजवंशी को कमेटी का चेयरमैन बनाया गया, जबकि डा. विपिन कौशल और डा. सुरजीत सिंह को मेंबर बनाया। कमेटी को एक हफ्ते में रिपोर्ट सौंपने के निर्देश दिए थे। कमेटी के चेयरमैन डा. अरविंद राजवंशी का कहना है कि जांच में हमें पीजीआई का कोई रोल नहीं मिला है। न ही पीजीआई का कोई व्यक्ति शामिल है।

इनके रिकार्ड चेक किए गए
पीजीआई ने अपनी जांच में उन केसों पर फोकस किया, जो मणिपुर के थे। जांच के दौरान देखा गया कि दो साल के भीतर मणिपुर के कुल 15 लोगों को ट्रांसप्लांट हुआ था। इनमें आठ वे थे, जो पति-पत्नी थे। शक की सुई इन्हीं लोगों पर थी, क्योंकि इनके संबंध की जांच करना थोड़ा मुश्किल होता था, जो भाई-बहन, पिता-पुत्र व मां-पुत्र उनके डीएनए सैंपल से पता चल जाता है। आठ दंपती के सभी कागज निकाले गए। उन्हें वेरिफाई किया गया। उसके बाद अथॉरिटी से चेक किए गए। उस व्यक्ति को भी बुलाया गया, जो खुड्डा लाहौरा में रहकर मणिपुर के लोगों के साथ को-आर्डिनेट करता है। उसकी भी जांच की गई, वह भी पाक-साफ निकला है।
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जो पकड़ी गई थी महिला, वह रजिस्टर्ड नहीं थी महिला
मणिपुर की जो महिला थी, उसका नाम पीजीआई के नेफ्रोलाजी डिपार्टमेंट में रजिस्टर्ड भी नहीं था। उसके नाम के सारे कागजात खंगाल डाले गए, मगर उसके नाम का कोई कागज नहीं मिला था। पुलिस का कहना था कि उसकी जांच पीजीआई में हो रही थी। कमेटी को इसका भी कोई रिकार्ड नहीं मिला है। ट्रांसप्लांट से पहले डोनर व रिसीपीएंट का नाम डिपार्टमेंट में दर्ज कराना होता है।

कमेटी ने दिए हैं ये सुझाव
कमेटी ने जांच के दौरान पाया है कि डोनर व रिसीपीएंट के कागज चेक करने वाले व्यक्ति की संख्या काफी कम है, जबकि काम का बोझ ज्यादा। सिस्टम को फुलप्रूफ बनाने के लिए तीन व्यक्तियों की और जरूरत है। दूसरा सुझाव कमेटी में लीगल मेंबर को शामिल करने का दिया गया है। पीजीआई का जो सिस्टम है जांच का, उसमें बदलाव की कोई जरूरत नहीं है।
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