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कालका स्टेशन पर लगे कालका-शिमला रेल लाइन बिछाने में योगदान देने वाले बाबा भलकू की प्रतिमा

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कालका-शिमला रेल लाइन के निर्माण में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले बाबा भलकू का कालका रेलवे स्टेशन पर प्रतिमा लगाने की मांग जोर पकड़ती जा रही है। अंग्रेज इंजीनियरों ने बाबा भलकू के सहयोग से ही इस रेल मार्ग को पूरा किया था। तत्कालीन अंग्रेज शासकों ने उनको अविस्मरणीय योगदान के लिए कई बार उपाधियों और सम्मान से नवाजा भी था। शहीद भगत सिंह ग्रुप कालका के प्रधान अभिनव और सिद्ध जोगी सेवादल के संस्थापक सन्नी ने अधिकारियों से मांग की है कि बाबा भलकू के प्रयास से ही कालका-शिमला रेल लाइन अस्तित्व में आया। उनके इस अविस्मरणीय योगदान को कभी भुलाया नही जा सकता। उन्होंने मांग की है कि कालका रेलवे स्टेेशन पर भी देश विदेश से भारी तादाद में सैलानी पहुंचते हैं ऐसे में स्टेेशन का एक अपना वजूद है। उन्होंने मांग की है कि यहां पर भी बाबा भलकू के महत्वपूर्ण योगदान को दर्शाने वाला कोई शिलापट्ट अथवा उनकी प्रतिमा होनी चाहिए ताकि ज्यादा से ज्यादा सैलानियों को उनके इस योगदान के बारे में पता चल सके।
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विलक्षण प्रतिभा के धनी थे बाबा भलकू राम
बाबा भलकू राम चायल के समीप झाझा गांव के एक अनपढ़ किंतु विलक्षण प्रतिभा के संपन्न थे। जब सारे अंग्रेज इंजीनियर कालका- शिमला रेल लाइन का सर्वे करने में असफल हो गए तब बाबा भलकूराम की सलाह और सहयोग से अंग्रेज इंजीनियर शिमला- कालका रेलवे लाइन के निर्माण में सफल हो पाए थे। हिंदुस्तान तिब्बत रोड के निर्माण के वक्त भी बाबा भलकू के मार्ग निर्देशन में न केवल सर्वे हुआ बल्कि सतलुज नदी पर कई पुलों का निर्माण भी हुआ था। जिसके लिए उन्हें ब्रिटिश सरकार के लोक निर्माण विभाग द्वारा ओवरसियर की उपाधि से नवाजा था। कहा जाता है की भलकू अपनी एक छड़ी से नपाई करता और जगह-जगह सिक्के रख देता। उसके पीछे चलते अंग्रेज सर्वे का निशान लगाते चलते। जहां अंग्रेज इंजीनियर फेल हो गए वहां अनपढ़ ग्रामीण ने एक छड़ी के सहारे इस मुश्किल कार्य को अंजाम दिया। बताया जाता है कि चायल से करीब आधे घंटे की दूरी पर भलकू का गांव है। वह घर भी है जिसमें वह रहते थे। सौ से ज्यादा साल पुराना यह घर लकड़ी का बना है और अभी तक यह वैसा ही खड़ा है जो उनके इंजीनियरिंग कौशल का एक अद्भुत नमूना है।
इंजीनियर की विफलता के बाद बाबा भलकू ने तैयार किया रेलवे ट्रैक का खाका
जानकारी के अनुसार कालका शिमला रेल खंड के निर्माण के समय सुरंग संख्या-33 बनाते वक्त अंग्रेजी इंजीनियर सुरंग का छोर मिलाने में असफल हो गए थे। इस कारण अंग्रेजी हुकूमत ने उस पर एक रुपया जुर्माना लगाया था। शर्मिंदगी के चलते इंजीनियर बड़ोग ने खुदकुशी कर ली थी। इसी बीच गांव झाझा के बाबा भलकू ने अपनी छड़ी के साथ अंग्रेज इंजीनियर को राह दिखाई। इसके बाद सुरंग के दो छोर मिले और कालका-शिमला रेलमार्ग का निर्माण पूरा हो सका। रेलवे में श्रमिक बाबा भलकू ने ही अपनी लाठी से इस पहाड़ी के नीचे प्रस्तावित सुरंग का दूसरा मुहाना निकाला। इसकी लंबाई एक किलोमीटर 143 मीटर और 61 सेंटीमीटर है। नौ नवंबर 1903 को शुरू की गई कालका-शिमला रेल लाइन को मूल रूप से 107 सुरंगों के बीच से निकाला गया था, लेकिन अब यह रेलवे लाइन 102 सुरंगों से होकर गुजरती है। कालका-शिमला टॉय ट्रेन 869 पुलों और 919 तीखे मोड़ों से होकर गुजरती है। इसका सबसे कम 48 डिग्री का तीखा मोड़ इंजीनियरिंग कौशल की मिसाल है। मनमोहक वादियों से गुजरती देश की सबसे संकरी रेल लाइन बेजोड़ इंजीनियरिंग का उदाहरण है.
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द ग्रेटेस्ट नैरो गेज इंजीनियरिंग ऑफ इंडिया
इस क्षेत्र पर रेल लाइन बिछाने का कार्य बेहद चुनौतीपूर्ण था। चट्टानों के गिरने वाले क्षेत्रों के किनारे निर्माण करने का सवाल ही नहीं था, इसलिए पहाड़ियों की तलहटी में खोदकर रास्ता बनाना एकमात्र विकल्प था। गहरी घाटियों की कम चौड़ाई पर कार्य करने की समस्या से निपटने के लिए उन घाटियों की ऊंचाई को काटकर और समतल बनाकर बुद्धिमानी से पुलों का निर्माण किया गया। ‘गिनीज बुक ऑफ रेल फैक्ट्स एंड फीट’ ने इसे ‘द ग्रेटेस्ट नैरो गेज इंजीनियरिंग ऑफ इंडिया’ बताया है। इस रेलवे लाइन को रिकॉर्ड चार वर्ष में पूरा किया गया. यूनेस्को ने 2008 में इसे विश्व धरोहर घोषित किया था।
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