पंचकूला। नगर निगम का विकास छह माह बाद भी एजेंडों से बाहर नहीं निकल पाया है। कल नगर निगम हाउस की दूसरी बैठक है, लेकिन मार्च हाउस की बैठक में पास 70 फीसदी एजेंडा कागजों में हैं। इन एजेंडों को लेकर हर बार की तरह पार्षद 6 अक्तूबर को महापौर और नगर निगम के अधिकारियों से सवाल करेंगे। नगर निगम के इंजीनियरिंग विंग के अधिकारियों का जवाब होगा कि कुछ प्रोजेक्टों का टेंडर लग चुका है, कुछ पाइप लाइन में हैं। कुछ पर काम इस सप्ताह शुरू हो जाएगा। यह सिलसिला चलता रहेगा, लेकिन विकास धरातल पर नहीं उतरेगा। हर बार की तरह पार्षद सदन में हंगामा करेंगे।
इन एजेंडाें पर निगम एक कदम भी नहीं चल पाया
एक नंबर : सेक्टर-20 में श्मशानघाट के पास लावारिस पशुओं को रोकने के लिए तारबंदी नहीं की गई। यहां सीसीटीवी कैमरे भी नहीं लगाए गए और ना ही सेक्टर में मुख्य दीवार नंदी को रोकने के लिए सेक्टर के अंदर दीवार भी नहीं बनाया गया।
दो नंबर : वार्ड नंबर सात के बुढ़नपुर में श्मशान घाट के लिए आजतक निशानदेही नहीं करवाई गई। प्रस्ताव पास होने के बाद भी कम्युनिटी सेंटर पर एक कदम नहीं चल पाया है। यहां की रोड गलियां आजतक नहीं बनीं। यहां लोगों के लिए धर्मशाला बनाई थी, उसे सेवा भारती को हैंडओवर कर दिया गया है। जबकि आंगनबाड़ी केंद्र में दो फ्लोर पहले से संस्था का निगम ने दे रखा। पब्लिक की सुविधा के लिए यहां कुछ भी नहीं है।
तीन नंबर : शहर में गांधी कॉलोनी, राजीव और इंदिरा कॉलोनियों के अलावा खड़क मंगोली काॅलोनी में एक मरला के प्लाॅटों के लिए नगर निगम हरियाणा सरकार को हर बार मंजूरी के लिए प्रस्ताव भेजता है, लेकिन आज तक कालोनी वालों को करनाल की तर्ज एक-एक मरले का प्लॉट नहीं मिला।
चार नंबर : पीएमडीए को एजुकेशन सिटी बनाने के लिए गांव चंडीमंदिर के अंदर 100 एकड़ जमीन एजुकेशन सिटी/यूनिवर्सिटी बनाने के लिए ट्रांसफर करने के संबंध में सदन ने मंजूरी दी थी, लेकिन यह प्रस्ताव भी कागजों में है क्योंकि यह संभव ही नहीं है।
पांच नंबर : शहर के लोगों की समस्या को देखते प्रस्ताव पास किया गया था कि हर वार्ड में एक एंबुलेंस सहित ड्राइवर करवाना था। पहले 5 एंबुलेंस किराए पर लेकर सामुदायिक केंद्रों में इनका प्रावधान किया जाना था। इस पर मंजूरी ही नहीं मिली। वहीं 5 फ्यूनरल वैन उपलब्ध करवाई जानी थी। इसकी फाइल भी नहीं चली।
छह नंबर : सेक्टर 20 की आशियाना कालोनी में बढ़ती चोरियां की वारदात को लेकर सीसीटीवी कैमरे लगाने का प्रस्ताव रखा गया था।
सात नंबर : झुरीवाला में वन विभाग को जमीन वापस देकर सेक्टर- 25 और 26 के बाहर बने ग्रीन बेल्ट को वन भूमि से मुक्त करा कर निगम को सौंपने की मांग की गई थी। साथ ही यहां निकलने वाले जंगली जानवरों खासतौर पर बंदर को लेकर पुख्ता सुरक्षा प्रबंध किए जाने स्वीकृति दी गई थी। इसपर भी कुछ नहीं हुआ।
ये हैं दिक्कतें.
निगम के प्रस्ताव यथार्थ के धरातल पर उतर पाते अमर उजाला ने जब इसकी छानबीन की तो पाया कि इसमें कई दिक्कत हैं। सबसे बड़ी बात तो यह है कि निगम में प्रस्ताव पास होने का मतलब यह कतई नहीं कि वह काम हर हालत में होगा क्योंकि प्रस्ताव पास होने के बाद ही यह देखा जाता है कि यह फिजिबल है या नहीं। यदि फिजिबल है तो फिर यह देखा जाता है कि इस पर कोई कानूनी अड़चन तो नहीं। यह क्लियर होने के बाद यह देखा जाता है कि इसके लिए बजट कितना चाहिए। यह पैसा आएगा कहां से? दूसरी दिक्कत यह है कि कुछ प्रस्ताव हाउस की बैठक में पास होने के बाद उन्हें सरकार से मंजूरी नहीं मिलती। वहीं प्रोजेक्टों को अमली जामा पहनाने के लिए कोई निश्चित समय सीमा नहीं है। इस वजह से कि सी अधिकारी की जिम्मेदारी फिक्स नहीं है। इसलिए अधिकारीभी प्रस्ताव को बहुत गंभीरता से नहीं लेते। इसके अलावा एक करोड़ से ज्यादा के प्रस्ताव सरकार से अनुमति के लिए भेजे जाते हैं।