जस्टिस मित्तल ने याचिकाकर्ता के फेसबुक लाइव सत्र के ट्रांसस्क्रिप्ट देखने के बाद कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि याचिकाकर्ता कोरोनावायरस के कारण लाकडाउन लगाने से नाखुश था। उसने भारत सरकार व पंजाब सरकार द्वारा महामारी से संभालने और सरकारों के कामकाज की आलोचना की है। उसने सरकारों के उच्चाधिकारियों के साथ-साथ चुने हुए प्रतिनिधियों के खिलाफ भी तीखी और अपमानजनक भाषा का इस्तेमाल किया है, लेकिन यह सब नफरत फैलाने के लिए नहीं है। यह धार्मिक असहमति या सांप्रदायिक सद्भाव को बाधित करने के लिए भी नहीं है।
असंतोष की अभिव्यक्ति है सरकार की आलोचना
बेंच ने कहा कि यह सरकार के कामकाज और उसकी नीतियों की आलोचना के साथ असंतोष की अभिव्यक्ति है। लोकतंत्र में, प्रत्येक नागरिक को स्वतंत्र रूप से अपनी राय रखने और सरकार के कामकाज की आलोचना करने का अधिकार है। हालांकि, यह सभ्य तरीके से किया जाना चाहिए और असंसदीय भाषा को नहीं अपनाया जाना चाहिए। सरकार को भी राजद्रोह और धार्मिक असहमति से संबंधित कानूनों को लागू करते समय अधिक सहिष्णु और चौकस रहने की जरूरत है।