चंडीगढ़। अक्तूबर, 1998 में सीनियर अधिकारियों के साथ मारपीट और दुर्व्यवहार के आरोप में सीआईएसएफ कांस्टेबल को नौकरी से निकालने के 27 साल बाद पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने उसे बहाल करने का निर्देश दिया है। हाईकोर्ट ने कहा कि आरोपों को साबित करने के लिए सबूत काफी नहीं हैं और सजा बहुत ज्यादा थी।
पंजाब के रोपड़ निवासी रविंदर कुमार राणा की ओर से दायर याचिका को मंजूरी देते हुए जस्टिस संदीप मौदगिल ने कहा कि सेवा मामलों में अनुशासनात्मक कार्यवाही और वह भी खासकर सीआईएसएफ जैसे सिविल या अर्धसैन्य बलों से जुड़े मामलों में प्राकृतिक न्याय और तर्कसंगत निर्णय लेने के दोहरे सिद्धांतों द्वारा शासित होती है।
हालांकि अथॉरिटी को अनुशासन के मामलों में व्यापक विवेक का अधिकार है लेकिन ऐसे विवेक का इस्तेमाल मनमाना न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए न्यायिक समीक्षा की जा सकती है। कोर्ट का यह भी मानना था कि सजा दुर्व्यवहार की गंभीरता के हिसाब से होनी चाहिए और अंतरात्मा को झटका नहीं लगना चाहिए।
राणा को 1992 में सीआईएसएफ में भर्ती किया गया था और जब उन्हें जून 1998 में एक सुपीरियर अधिकारी पर हमला करने, दुर्व्यवहार के आरोपों में निलंबित किया गया था, तब वह असम में ओएनजीसी नाजिरा यूनिट में तैनात थे। विभागीय जांच के बाद उन्हें 5 अक्तूबर, 1998 को सेवा से हटा दिया गया था।
उनकी अपील मई 1999 में खारिज कर दी गई थी। इसके खिलाफ उन्होंने हाईकोर्ट का रुख किया। कोर्ट को बताया गया कि हमले की घटना से पहले भी याची के खिलाफ कई अनुशासनात्मक कार्रवाई हुई हैं। जस्टिस संदीप मौदगिल की बेंच ने कहा कि पिछले आचरण का इस्तेमाल नौकरी से निकालने को सही ठहराने के लिए नहीं किया जा सकता, जब मौजूदा आरोप साबित नहीं हुए हों।