अध्ययन से मिले परिणाम में मरीजों की आंखों पर 58 प्रतिशत, नाक, आंख और दिमाग पर 27 प्रतिशत और फेफड़ों पर 9 प्रतिशत असर पड़ा। यह बात भी सामने आई कि मर्ज के लक्षण आने के बावजूद इलाज में देरी से संक्रमण मस्तिष्क तक पहुंचा। प्रो. चक्रवर्ती का कहना है कि इस बीमारी में इलाज में देरी मौत का कारण बन सकती है, इसलिए लक्षण दिखते ही तत्काल इलाज शुरू करवाएं।
ब्लड शुगर और स्टेरॉयड पर नियंत्रण से ही बचाव संभव
प्रो. चक्रवर्ती ने बताया कि अध्ययन के दौरान सामने आए तथ्यों से यह बात साफ हो चुकी है कि अनियंत्रित ब्लड शुगर और ज्यादा मात्रा में दिया गया स्टेरॉयड इसका मुख्य कारण है। ऐसे में जरूरी है कि कोरोना के सभी मरीजों को स्टेरॉयड की डोज न दी जाए। वहीं, डॉक्टर मरीजों को तय मात्रा में सिर्फ 10 दिनों तक ही स्टेरॉयड दें न कि 30 दिनों तक। प्रो. चक्रवर्ती का कहना है कि ज्यादा मात्रा में स्टेरॉयड देने के बजाय मरीज को वेंटिलेटर या अन्य साधनों से सुरक्षित करने का प्रयास होना चाहिए।
मृतकों में 54 साल से अधिक उम्र के मरीज ज्यादा
अध्ययन से यह भी साबित हुआ है कि ब्लैग फंगस का खतरा 54 साल से अधिक उम्र के मरीजों में ज्यादा है। अध्ययन के दौरान इससे होने वाली मौतों में 6 सप्ताह के दौरान 38.3 फीसदी और 12 सप्ताह के बाद 45.7 फीसदी दर्ज की गई है। यह भी साबित हुआ है कि 54 साल के ज्यादा उम्र के जो कोरोना संक्रमित होकर आईसीयू में भर्ती हुए उन्हें ब्लैक फंगस होने के बाद मौत का जोखिम अधिक था।