ट्रांसप्लांट गेम्स में हिस्सा लेने पहुंचे एथलीट
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आसमां में मत ढूंढ अपने सपनों को, सपनों के लिए तो जमीं जरूरी है,
सब कुछ मिल जाए तो जीने का क्या मजा, जीने के लिए एक कमी जरूरी है...
जी हां, जीने के लिए एक ऐसी कमी का होना भी जरूरी है जिसे पूरा करने के लिए जीने की ललक बढ़ जाए और वो कमी हमें मौत को मात देने के काबिल बना दे। मौत को हराकर एक बार फिर से नई जिंदगी की शुरूआत करने वालों ने बुधवार को पीजीआई के स्पोर्ट्स ग्राउंड में अलग ही अंदाज में जीने का फलसफा सिखाया। यहां आयोजित ट्रांसप्लांट गेम 20-20 में ऑर्गन लेने व देने वाले देशभर के लगभग 500 लोगों ने विभिन्न खेलों में भाग लिया।
इस दौरान बैडमिंटन, किक्रेट, रस्साकशी, कैरम, वॉक, दौड़, सिंगिंग, डांसिंग, पोस्टर मेंकिग व रंगोली बनाने के मुकाबले करवाए गए। अपनी सकारात्मक सोच और जिंदगी जीने के जज्बे से उन्होंने दिखा दिया कि वे बाकियों से कमतर नहीं कहीं बेहतर हैं। किडनी खराब होने के बावजूद 17 साल के साहिल ने गाना नहीं बंद किया तो 75 साल की उम्र में पत्नी को किडनी देने वाले मल्कीयत सिंह का जज्बा एक युवा से किसी मायने में कम नजर नहीं आया।
अपनी आवाज से बनानी है पहचान
लुधियाना के 17 वर्षीय साहिल दास की किडनी 2014 में खराब हो गई थी। डॉक्टरों ने डायलिसिस शुरू कर दी। दिसंबर 2019 में किडनी प्रत्यारोपण हुआ। इस दौरान लगातार 6 सालों तक डायलिसिस के साथ साहिल ने गाने के शौक को जिंदा रखा। साहिल का कहना है कि दुनिया में अपनी आवाज से अलग पहचान बनाए बिना जाने का सवाल ही नहीं उठता। एक अंग की कमी केकारण जिंदगी खत्म हो जाए ये पुराने जमाने की बात है। इस दौरान साहिल ने अपनी आवाज का जादू बिखेरा और कार्यक्रम में वाहवाही बटोरी। बता दें कि साहिल 2019 में इंडियन आइडल का ऑडिशन भी दे चुके हैं।
ओलंपिक में जीता पदक
किडनी खराब हुई तो मुझे जिंदगी की अहमियत समझ आई। फिर क्या था, किडनी ट्रांसप्लांट के बाद उस अहमियत को साबित करने में जुट गया। अपनी सकारात्मक सोच के बल पर ही मैंने ओलंपिक में स्क्वैश में भारत को रजत पदक दिलाया। ये कहना है जबलपुर के दिग्विजय सिंह का, जिन्होंने किडनी फेल्योर के 9 साल केदौर को झेलते हुए खुद कोनया जीवन देने की सोच जागृत की। अंकल से किडनी मिली तो नई शुरूआत करने में जुट गए। दिग्विजय अपनी फिजिकल फिटनेस केलिए प्रतिदिन तीन घंटे वर्क आउट करते हैं।
प्यार के अटूट रिश्ते ने बना दिया नायाब
चंडीगढ़ के सवीन और बीनू की कहानी भी बेहद खास है। शादी के सात साल बाद पति की किडनी खराब हो गई। एक साल तक किडनी डोनर की तलाश की। सफलता नहीं मिली तो पत्नी ने अपनी एक किडनी देकर पति की जान बचाई। चौंकाने वाली बात यह है कि सवीन को अपनी एक किडनी देने के बाद भी उन्होंने स्वस्थ संतान को जन्म दिया है। इस दंपति का कहना है कि अंग देने से जान नहीं जाती बल्कि जान से प्यारे किसी अपने की जान बचती है। इसलिए कही-सुनी बातों को अनदेखा कर जीते जी जिंदगी बचाने के लिए आगे आएं।
इनकी कहानी भी बेमिसाल है
चंडीगढ़ में सरकारी नौकरी करने वाले 50 वर्षीय प्रवीण कुमार रतन और उनकी पत्नी रूपा अरोड़ा की कहानी भी बेमिसाल है। पति की जान बचाने के लिए पत्नी ने अपना लीवर डोनेट किया और अब दोनों बिल्कुल फिट हैं। खास बात यह है कि इस दंपति को 2019 में यूके में आयोजित वर्ल्ड ट्रांसप्लांट गेम्स में पहली बार भारत का प्रतिनिधित्व करने का अवसर प्राप्त हुआ है। ये गेम 1978 से आयोजित किए जा रहे हैं।