चंडीगढ़। पंजाब सरकार व स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड द्वारा दायर एक रेगुलर दूसरी अपील को पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने खारिज करते हुए 2006 में शुरू हुए कानूनी विवाद को खत्म कर दिया है। कोर्ट ने कहा कि गोद लिए गए बेटे को भी सगे बेटे की तरह पूर्ण अधिकार हैं और ऐसे में अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे बोर्ड के एक मृत कर्मचारी द्वारा गोद लिए बेटे को सभी पेंशन और रिटायरमेंट के फायदे 9 प्रतिशत सालाना ब्याज के साथ दें।
जस्टिस सुदीप्ति शर्मा ने ट्रायल कोर्ट और पहली अपीलीय अदालत के फैसलों को सही ठहराते हुए कहा कि लंबे समय तक चले मुकदमे ने जगन नाथ को लगभग दो दशकों तक उसके हक के पैसों से गलत तरीके से वंचित रखा। यह अपील 2005 में जगन नाथ के पक्ष में दिए गए एक सिविल मुकदमे के फैसले से जुड़ी थी। जगन नाथ ने जोखू राम की फैमिली पेंशन और अन्य सेवा लाभ का दावा किया था जिन्होंने बोर्ड में लगभग 30 साल तक चौकीदार के रूप में काम किया था और अविवाहित ही उनकी मृत्यु हो गई थी। जगन नाथ ने दावा किया कि उन्हें 1990 में जोखू राम ने अपने असली माता-पिता की सहमति से कानूनी तौर पर गोद लिया था।
बोर्ड की गोद लेने को चुनौती को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि 26 दिसंबर 1990 का गोद लेने का दस्तावेज याची के असली माता-पिता की गवाही से साबित हो गए हैं। बोर्ड के अनुसार याची को जब गोद लिया गया था तो उसकी आयु 15 वर्ष से अधिक थी जबकि गोद लेने के दस्तावेज के अनुसार उस समय उसकी आयु लगभग 14 साल थी।
बोर्ड द्वारा मृतक कर्मी की बकाया सैलरी और अन्य रकम पहले ही जगन नाथ को इस आधार पर दी जा चुकी थी कि वह मृत कर्मचारी का बेटा और कानूनी वारिस है। जस्टिस शर्मा ने रिकॉर्ड किया कि 2006 में दायर दूसरी अपील का फैसला लगभग 19 साल बाद किया गया, जिसके कारण याची फायदों के अधिकार से वंचित रहा। कोर्ट ने कहा कि न्याय की मांग है कि प्रतिवादी को आगे की कार्रवाई के लिए मजबूर न किया जाए।