पंचकूला। अब स्कूली बच्चों में भी स्किन से संबधित बीमारियां आम हो गई हैं, लेकिन सबसे ज्यादा खतरा हैंड-फुट एंड माउथ डिजीज (एचएफएमडी) का है। यह संक्रमण से फैलने वाली बीमारियों में से एक है और 3 से 8 साल तक के बच्चे सबसे ज्यादा प्रभावित होते हैं। स्किन हास्पिटल के आंकड़ों पर नजर डालें तो पहले जहां हर महीने 10 से 15 केस पहुंचते थे, वहीं अब इसकी संख्या 60 तक पहुंच गई है। यह आंकड़ा पांच सालों में सबसे ज्यादा चौंकाने वाला है।
अगस्त से अक्तूबर तक आते हैं ज्यादा केस
स्किन एक्सपर्ट के मुताबिक, यह बीमारी कॉक्ससेकी और एनटेरो वायरस से फैलती है। वर्ष 1957 में न्यूजीलैंड में सबसे पहले इसका पता चला और भारत में वर्ष 2004 से एक दो केस आने लगे। वर्ष 2007 से इसके केस बढ़ने लगे हैं। अगस्त, सितंबर और अक्तूबर में इस बीमारी का ज्यादा खतरा होता है, लेकिन अब तक इस बीमारी की कोई वैक्सिन नहीं बनी है।
बीमारी के कारण
- स्कूल में बच्चे एक-दूसरे की वाटर बॉटल से पानी पीते हैं। साथ लंच करते हैं, लेकिन उन्हें यह नहीं पता होता कि किस बच्चे में संक्रमण जनित बीमारी है। ऐसे में दूसरे बच्चों में भी संक्रमण फलने का खतरा रहता है।
- खुले में बिकने वाली बाहर की चीजें खाने या बगैर हाथ धोए कुछ खाने से भी इसका खतरा बना रहता है।
शुरुआती लक्षण
- हाथ, मुंह और पैर पर सफेद या लाल दाने या छाले पड़ना
- गले में खरास, बुखार के बाद चेहरे और होंठ के अंदर दाने निकलना
- थकान और भूख ना लगना
(अगर समय रहते उपचार नहीं कराया गया तो जानलेवा बुखार भी हो सकता है)।
इनके लिए ज्यादा खतरनाक
- जिन बच्चों का वेट कम है
- ऐसे केस में मेनिनजाइटिश और एनकेफ्लाइटिश की संभावना बढ़ जाती है।
- मेनिनजाइटिस होने पर ब्रेन के ऊपरी हिस्से मेें स्वेलिंग
- एनकेफ्लाइटिश होने पर ब्रेन और गर्दन में स्वेलिंग
- ऐसे में मरीज के लिए गर्दन हिलाना तक मुश्किल होता है
- मरीज को हाइग्रेन फीवर हो जाता है और उसे अस्पताल में दाखिल तक करना पड़ता है।
शिक्षक और अभिभावक रखें खास ध्यान
यदि किसी स्कूल के किसी बच्चे को यह बीमारी है तो धीरे-धीरे यह अन्य बच्चों में भी फैल सकती है। ऐसी स्थिति में उस बच्चे को मेडिकल लीव पर भेज देना चाहिए। अगर घर में किसी बच्चे को इस तरह की परेशानी है तो उसका जूठा खाना और पानी दूसरे को नहीं शेयर करना चाहिए।
कोट
हैंड, फुट एंड माउथ डिजीज ने इस बार पांच सालों का रिकार्ड तोड़ दिया है। मेरे अस्पताल में एक महीने में 60 केस पहुंच चुके हैं। चिंता की बात यह है कि इस बीमारी से 3 से 8 साल के स्कूली बच्चे ही सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
- डा. विकास शर्मा, नेशनल स्किन हास्पिटल, एमडीसी, सेक्टर-5