लंग्स ट्रांसप्लांट करने वाला पीजीआई बना देश का पहला अस्पताल
अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़।
पीजीआई ने अपने पहले लंग्स (फेफड़ा) ट्रांसप्लांट को सफलतापूर्वक अंजाम दे दिया है। किसी सरकारी अस्पताल में लंग्स ट्रांसप्लांट करने वालों में पीजीआई देश का पहला हास्पिटल बन गया है। अब तक देश के किसी भी सरकारी अस्पताल में लंग्स ट्रांसप्लांट नहीं हुआ है। नई दिल्ली स्थित एम्स भी यह कार्य पूरा नहीं कर सका है। 22 वर्षीय युवक का 35 वर्षीय महिला में लंग्स ट्रांसप्लांट हुआ है। इस पूरे आपरेशन में करीब 13 घंटे लगे। इसमें पीजीआई के अलग-अलग डिपार्टमेंट के करीब 20 से ज्यादा डॉक्टर व स्टाफ शामिल थे।
पीजीआई के डायरेक्टर प्रोफेसर जगत राम ने बताया कि मोगा का 22 वर्षीय युवक भोला सिंह दस जुलाई को गंभीर हालत में पीजीआई में दाखिल हुआ। युवक एक्सीडेंट में गंभीर घायल था। हालत में सुधार की कोई गुंजाइश नहीं बनने की स्थिति में डॉक्टरों ने उसे ब्रेन डेड घोषित कर दिया। आर्गन डोनेशन पर परिजनों की सहमति मिलने के बाद डॉक्टरों ने उसके अंगों की जांच की। जांच में किडनी, लंग्स, हार्ट, कोर्निया और लिवर ठीक मिले। इस बार पीजीआई का सबसे ज्यादा फोकस लंग्स पर था। क्योंकि ऐसा काफी दिन बाद हुआ था, जब किसी दिवंगत डोनर का लंग्स ठीकठाक था। तुरंत ऐसे मैचिंग मरीज की तलाश शुरू की गई, जिसमें डोनर का लंग्स फिट बैठ सके। जांच-परख के बाद मरीज संगरूर की 35 साल की महिला मिली।
महिला को तुरंत पीजीआई बुलाया गया। सभी जरूरी टेस्ट कराए गए। टेस्ट रिपोर्ट ठीक मिलने के बाद डॉक्टरों को सूचित कर ट्रांसप्लांट की तैयारी में जुट गए। सोमवार रात डेढ़ बजे ट्रांसप्लांट की प्रक्रिया शुरू हुई, जो करीब अगले दिन मंगलवार को ढाई बजे समाप्त हुई। डाक्टरों के मुताबिक मरीज पूरी तरह से ठीक है। आईसीयू में दस दिन तक निगरानी में रखा जाएगा।
आक्सीजन पर जिंदा थी, 5 प्रतिशत काम कर रहा था फेफड़ा
संगरूर की रहने वाली जिस महिला में लंग्स ट्रांसप्लांट किया गया है, उसकी जिंदगी आक्सीजन के सहारे चल रही थी। सिर्फ पांच प्रतिशत उसके फेफड़े काम कर रहे थे। महिला के परिजनों ने बताया कि करीब दो साल से उसे कफ की शिकायत थी। एक साल पहले पता चला कि उसे इन्टर्स्टिशल लंग्स डिजीज (आईएलडी) हो गई है, इसमें फेफड़े काम करना बंद कर देते हैं। एक महीने तक वह पीजीआई इमरजेंसी में भी एडमिट रही थी।
ट्रांसप्लांट के बाद कितना रहेगा खतरा
लंग्स ट्रांसप्लांट में शामिल कार्डियोवस्कुलर एंड थोरासिस सर्जरी के प्रोफेसर राणा संदीप सिंह से जब पूछा गया कि ट्रांसप्लांट के बाद मरीज कितने साल तक जीवित रह सकता है तो उनका जवाब था कि 50 प्रतिशत लोग पांच साल तक जीवित रहते हैं। जबकि 50 प्रतिशत इससे कम साल तक जीवित रह पाते हैं। जब उनसे पूछा गया कि जब इतना रिस्क है तो ट्रांसप्लांट क्यों कराया जाए। उनका कहना था कि ट्रांसप्लांट से मरीज की जिंदगी बेहतर होती है। जब फेफड़े काम नहीं करते तो मरीज की जिंदगी आक्सीजन के सहारे चलती है। और रिस्क फैक्टर मरीज पर भी निर्भर करता है। कुछ मरीज पांच साल से ज्यादा वक्त जीते हैं।
ट्रांसप्लांट पर आए खर्चे पर पीजीआई करेगा मदद
ट्रांसप्लांट कराने वाली महिला की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। उसका पति राजमिस्त्री का काम करता है। ट्रांसप्लांट के वक्त उसके पास सिर्फ 20 हजार रुपये थे। जबकि ट्रांसप्लांट में करीब पांच से छह लाख तक खर्च आएगा। ट्रांसप्लांट के बाद दवाई में हर महीने दस हजार रुपये का खरचा है। इस पर पीजीआई डायरेक्टर प्रोफेसर जगतराम ने कहा कि पीजीआई मरीज की हर संभव मदद करेगा। यदि जरूरत पड़ी तो आर्थिक मदद भी की जाएगी।
साल 2013 से थी लंग्स ट्रांसप्लांट की
साल 2013 में पीजीआई को लंग्स ट्रांसप्लांट की क्लीयरेंस मिली। उसके बाद से पीजीआई ट्रांसप्लांट की तैयारी में था, लेकिन डोनर और मरीज नहीं मिल पा रहा था। इस पर राणा संदीप सिंह ने बताया कि इसके लिए उपयुक्त समय की तलाश थी। हालांकि करीब डेढ़ महीने पहले भी पीजीआई को लंग्स मिला था, लेकिन डाक्टर नहीं होने के कारण उसे मुंबई भिजवा दिया गया था। लंग्स के अलावा मरीज की किडनी, कोर्निया और लिवर भी ट्रांसप्लांट किया गया है।
22 साल के युवक का फेफड़ा 34 साल की महिला में लगाया
13 घंटे सर्जरी, 20 से डॉक्टर व स्टाफ ने की सफल सर्जरी