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मैं अंबरसर दा जलियांवाला बाग बोलदा हां

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चंडीगढ़। मैं आजादी दी लाट हां कविता ने जहां शहीदों के दर्द को बयां किया, वहीं जलियांवाला बाग के पास रहने वाली रत्नी देवी के नजरों के सामने वो मौत का मंजर आज एक बार फिर मानो जीवित हो गया। वो मां और बच्चों की चीखें, वो खून से लथपत मंजर ने आज भी लोगों के जेहन को मानो झंझोर दिया हो। 100 साल पूरे अमृतसर के उस खूबसूरत जलियांवाला बाग में हुए मासूमों के मौत का मंजर एक बार फिर शहर के लोगों ने महसूस किया। इस कांड पर बनी डॉक्यूमेंटी ने लोगों की आंखें नम कर दी। यह मंगलवार पंजाब कला भवन सेक्टर-16 में गाथा जलियांवाला बाग में पेश की गई। इसमें जलियांवाला बाग कांड में मारे गए निदोषों को श्रद्धांजलि दी गई। यह कार्यक्रम पंजाब साहित्य अकादमी की ओर से आयोजित किया गया।
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कविताओं से दी गई शहीदों को श्रद्धांजलि
कार्यक्रम की शुरुआत में अमृतसर के जलियांवाला बाग कांड के दर्द भरे उस दिन की तस्वीरों को स्लाइड शो के जरिए बयां किया गया। इसमें करीब 100 से अधिक तस्वीरों के जरिए उस दर्द को बयां किया गया। इसके बाद सरकारी सेकेंडरी स्कूल पंजौरी कलां की छात्राओं रमनदीप कौर ने सिक्के दे दाग कविता सुनकर शहीदों को श्रद्धांजलि दी। अन्य छात्रा सुखदीप कौर ने ‘वैसाखी फेर परतेगी’ से कांड में बेकसूरों के दर्द को बयां किया। इसके बाद मंच पर नाटक ‘मैं अंबरसर द जलियांवाला बाग बोलदा हां’ का मंचन किया गया।
नाटक में दिखाया गया कि किस तरह जलियांवाला बाग में मासूम बच्चों, मांओं और लोगों को मौत के घाट उतार दिया गया। नाटक के जरिए जलियांवाला बाग में गोलाबारी के उस समय को दिखाया, जिसमें लगभग दस लाख लोग थे। इसमें से 62 हजार मारे गए और 60 हजार से ज्यादा लोग जख्मी हो गए। कुछ का पता ही नहीं चल पाया। अंग्रेजों से लड़ने के लिए किस तरह गदर पार्टी बनाई गई। गोलाबारी के समय किस प्रकार लोग दीवारों पर चढ़कर अपने जान बचाने की कोशिश कर रहे थे। किस प्रकार लोग अपनी जान बचाने के लिए चीखते हुए कुएं में कूद गए। कलाकारों ने सरदार भगत सिंह, राजगुरु, सुखदेव, करतार सिंह सराबा और ऊधम सिंह की कुर्बानियों को याद करते हुए उनको नमन करने का संदेश दिया।
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नाटक में जलियांवाला बाग हादसे में बचे नानक और रत्नी देवी के दर्द को भी दिखाया गया। रत्नी देवी का घर जलियांवाला बाग के साथ था। वह अपने घर में गोलियों की आवाज सुन रही थी लेकिन उनके पति बाग में थे। इसलिए उनके पति अंग्रेजों की गोली का शिकार हो गए। वह हादसे के बाद रोती हुई। अपने पति को सैकड़ों लाशों के बीच ढूंढ रही थी। कुत्ते मरे लोगों को नोचने के लिए लाशों की तरफ आ रहे थे। वह बिलखाती ह़ुई उनको हटा रही थी। मंच पर यह दृश्य कलाकारों ने बेहतरीन अभिनय के जरिए दिखाया। यह सीन इतनी खूबसूरती से बयां किया गया कि रत्नी देवी का दर्द दर्शकों की आंखों में साफ झलक रहा था। इसके बाद नाटक में शहीद ऊधम सिंह की जिंदगी को दिखाया, जो इस कांड में बच गए थे। इसमें दिखाया गया कि किस तरह उन्होंने विदेशों में जाकर पढ़ाई करके जलियांवाला बाग हादसे के आरोपी डायर को मार कर इस हादसे का बदला लिया था। कार्यक्रम केमुख्य मेहमान दविंदर दमन ने कलाकारों एवं छात्राओं की प्रस्तुति की तारीफ की। उन्होंने देश के लिए कुर्बानी देने वाले सपूतों को नमन किया। साथ ही कहा कि हमेशा अपने देश के इतिहास को याद रखेगे।
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