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इंजीनियरिंग विभाग में बड़ा घपला

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बिना अप्रूवल करा दिए 45 लाख का काम
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इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में गड़बड़झाला : ऑडिट डिपार्टमेंट ने इंजीनियरिंग विभाग को मेमो किया इश्यू

दर्जनों काम पूरे नहीं फिर भी विभाग ने कांट्रेक्टर को कर दिया अधिक पेमेंट, खुलासे के बाद हड़कंप

अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। प्रशासन का इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट अपने अधिकारियों के अनूठे कारनामों को लेकर अक्सर चर्चा में रहता है। इस बार सोशल ऑडिट डिपार्टमेंट ने इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट पर काम का अप्रूवल लिए बगैर 45 लाख से अधिक का काम कराने का गंभीर आरोप लगाया है। इसके अलावा ऑडिट में विभाग पर अन्य कई और गंभीर आपत्तियां लगाई हैं। ऑडिट डिपार्टमेंट ने इसके लिए विभाग को मेमो इश्यू किया है। इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट में काम कराने के नाम पर सरकारी धन की बंदरबाट के खुलासे के बाद विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। पूरे घपले में यूटी प्रशासन के पूर्व अफसर के एक करीबी अधिकारी का नाम सामने आ रहा है।

ईपीएएफ में भी घपले की आशंका
ऑडिट रिपोर्ट में कहा गया है कि एग्जीक्यूटिव इंजीनियर ने बिना अप्रूवल 45 लाख 48 हजार 582 रुपये के काम करा दिए। ऑडिट विभाग ने सभी कामों का संपूर्ण ब्योरा देकर इसका जवाब इंजीनियरिंग विभाग से मांगा है। जानकारी के मुताबिक इंजीनियरिंग विभाग ने जो भी काम दिए उनमें लेबर का रिकार्ड मेंटेन नहीं है। इिसमें ईएसआई और ईपीएफ न काटने के घपले का अंदेशा है।
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इस तरह कांट्रेक्टर को पहुंचाया गया फायदा
इंजीनियरिंग विभाग की ओर से कराए गए कई कामों में एंटी टर्माइट वर्क और वाटर प्रूफिंग की सिक्योरटी डिपॉजिट के तौर पर 10 प्रतिशत की राशि नहीं काटी। यह राशि दस साल बाद रिलीज की जानी चाहिए थी लेकिन अधिकारियों ने ऐसा न कर विभाग के बजाय कांट्रेक्टर की फेवर की गई। ऑडिट विभाग ने इसके लिए विभाग को मेमो इश्यू किया है।

सरकारी पैसा बांटने में नहीं बरती गई कोई सावधानी
इंजीनियरिंग विभाग ने सरकारी पैसा बांटने में कोई सावधानी नहीं बरती। कई ऐसे मामले रहे हैं, जिसमें काम से ज्यादा राशि कांट्रेक्टर को दिए गए। लेकिन इनमें तय समय सीमा में 50 प्रतिशत तक ही काम हो पाया है। इनमें आयुर्वेदिक डिस्पेंसरी सेक्टर 24बी में 5.35 लाख की लागत से काम शुरू हुआ लेकिन इस पर महज 2.62 लाख रुपये ही खर्च किए गए और 48.97 प्रतिशत वर्क ही पूरा हो पाया। इसी तरह इंस्टीट्यूट ऑफ स्पेशल एजूकेशन सेक्टर-32 का काम 154.75 लाख की लागत से दिया गया लेकिन कांट्रेक्टर ने यहां भी महज 85.30 लाख रुपये खर्च कर महज 55.12 प्रतिशत काम पूरा किया।
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आखिर कांट्रेक्टर ने क्यों काम नहीं किया पूरा
अधिक पैसा दिए जाने के बाद भी काम क्यों पूरा नहीं हुआ। क्या कांट्रेक्टर बीच में काम छोड़ कर भाग गया। क्या कांट्रेक्टर ने पेमेंट न मिलने की वजह से काम बंद किया। ऐसे तमाम सवालों का जवाब इंजीनियरिंग विभाग ने इसका कोई कारण नहीं लिखा हुआ। कई कामों में फार्म 27 को मेंटेन नहीं किया गया। जिसमें संपूर्ण ब्योरा विभाग को भरना होता है। इसी तरह डिपॉजिट रजिस्टर भी मेंटेन नहीं रखा गया। सर्विस बुक्स भी पूरी नहीं थी।
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