(अमर उजाला अभियान : नशे की नर्सरी
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टास्क फोर्स फुस्स, हुक्का बार फिर आबाद
नवंबर 2016 के बाद से हुक्का बार पर नहीं हुई कार्रवाई
नशे की बनती जा रही है नर्सरी, बिना रोक-टोक पिलाए जा रहे हुक्का
आशीष वर्मा
चंडीगढ़।
शहर में फिर से हुक्का बार आबाद होने लगे हैं। बीते सवा साल में शहर के किसी भी हुक्का बार पर कोई कार्रवाई नहीं हुई है। नवंबर 2016 के बाद किसी भी हुक्के पर कार्रवाई नहीं हुई है, जबकि इससे पहले हर दूसरे-तीसरे महीने हुक्का बारों पर कार्रवाई होती रही है। मगर पिछले सवा साल से एक्शन ढीला पड़ गया है। न तो रेड पड़ रही और न ही भेजे गए सैंपलों की रिपोर्ट आ रही है। नियम के मुताबिक जब तक हुक्का फ्लेवर के सैंपल नहीं आते, तब तक उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती है। इसी का फायदा हुक्का बार संचालक उठा रहे हैं और धड़ल्ले से पैर पसारते जा रहे। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देश पर पंजाब, हरियाणा और चंडीगढ़ में एक टास्क फोर्स गठित की गई थी, जिसका काम था कि शहर में चल रहे हुक्का बारों पर समय-समय पर निगरानी की जाए, मगर ऐसा हुआ नहीं। युवक -युवतियां बिना किसी रोक-टोक के हुक्के का कश लगा रही हैं। इसके सेवन से वे नशे की जद में आ रही हैं।
रिपोर्ट और एक्शन का इंतजार
कब केस दर्ज हुआ यहां मारी गई थी रेड स्टेटस
आठ अगस्त 2015 एसीओ 47 सेक्टर-26 के बैक साइड रिपोर्ट के बाद कार्रवाई नहीं
आठ अगस्त 2015 एससीओ 47 सेक्टर-26 कस्बा लांज रिपोर्ट के बाद कार्रवाई नहीं
आठ अगस्त 2015 एससीओ 19 सेक्टर-26 कैफीना 26 रिपोर्ट के बाद कार्रवाई नहीं
आठ जुलाई 2016 एससीओ 18 परप्ल फ्राग सेक्टर-26 सैंपल की रिपोर्ट का इंतजार
18 जून 2017 चंडीगढ़ क्लब सैंपल की रिपोर्ट का इंतजार
11 जुलाई 2017 आईटी पार्क फार्म हाउस सैंपल की रिपोर्ट का इंतजार
18 जून 2017 सेक्टर 9 क्यूब रेस्टोरेंट सैंपल की रिपोर्ट का इंतजार
दो अगस्त 2017 शॉप नंबर 18 सेक्टर-18 सैंपल की रिपोर्ट का इंतजार
हर्बल के नाम पर देते हैं चकमा
हुक्का बार संचालकों का कहना है कि वे हर्बल हुक्का पिलाते हैं, जबकि सच्चाई यह है कि उसमें भी निकोटिन होता है। विशेषज्ञों का कहना है कि हर्बल नाम की कोई चीज नहीं है। यदि हर्बल होता तो कोई भी दूसरी बार नहीं आता। इसलिए संचालक भी निकोटिन डालते हैं, ताकि युवाओं में लत लगे और वे दोबारा से आएं। जब तक सीएफएसएल में जांच नहीं होती, तब तक यह कह पाना मुश्किल है कि फ्लेवर में निकोटिन है या हर्बल। पहले फ्लेवर पर निकोटिन की मात्रा लिखी होती थी, अब वो नहीं लिखा होता है, जो अब ज्यादा खतरनाक हो चुका है। नए ट्रेंड के मुताबिक संचालक फ्लेवर पर ऊपर से निकोटिन मिलाते हैं, ताकि पकड़े जाने की कोई गुंजाइश न रहे। हुक्का बार के खिलाफ लड़ाई लड़ने वाले पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के वरिष्ठ एडवोकेट हेमंत गोस्वामी कहते हैं कि आईपीसी की धारा 278 कहती है कि किसी भी तरह की ऐसा धुआं फैलाना, जिससे लोगों के स्वास्थ्य पर बुरा असर पड़ता है, उसके खिलाफ कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है।
जब से पुलिस को दिए निर्देश, तब से कार्रवाई धीमी पड़ी
22 अगस्त 2016 को चंडीगढ़ प्रशासन की ओर से सभी डीएसपी और एसचओ को निर्देश दिए गए थे कि वे अपने सीमा में आने वाले हुक्का बारों की जांच करें और पॉयजन एक्ट 1919 के तहत कार्रवाई करें। मगर जब से पुलिस को निर्देश दिए गए हैं, तब से हुक्का बारों के खिलाफ कार्रवाई में धीमापन आया है। साल 2017 में एक भी हुक्का बार सील नहीं हुआ, जबकि साल 2016 में नौ हुक्का बारों को सील किया गया। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि कैसे हुक्का बारों पर नरमी बरती जा रही है।
कोट
जब हाईकोर्ट में सुनवाई की तारीख नजदीक आती है तो टास्क फोर्स एक्टिव हो जाती है। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के निर्देश पर बनी टास्क फोर्स तीनों राज्यों में निस्क्रिय हो चुकी है। हर महीने मॉनीटरिंग होनी चाहिए थी, मगर ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है। इससे हुक्का बार संचालकों के हौसले बुलंद हो रहे और खुलते जा रहे।
-हेमंत गोस्वामी, सीनियर एडवोकेेट, पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट