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बुआई का समय जोरों पर, मिलना बंद हुआ खाद-बीज

Thu, 17 Nov 2016 04:34 PM IST
palwal
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- फोटो : ANI
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नोटबंदी का सरकारी फरमान खेती-किसानी के लिए कुठाराघात साबित हो रहा है। निजी एजेंसियां व दुकानदार तो पहले से ही प्रतिबंधित करंसी पो नेही ले रहे थे। सरकार द्वारा मंगलवार को किसान सेवा केंद्रों और सहकारी समितियों को भी 500 और 1000 रुपये के नोट लेना बंद करने का पत्र भेज दिया। 
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इसके बाद से सेवा केंद्रों और सहकारी समितियों ने पत्र प्राप्त होते ही किसानों को पुराने नोटों पर खाद, बीज इत्यादि देने से ना-नुकर शुरू कर दी। यहां तक कि सहकारी समितियों में किसानों के ऋण भी पुराने नोटों से जमा करने से इंकार कर दिया गया। 

इन दिनों जिले में गेहूं, जौ, चना इत्यादि फसलों की बिजाई चल रही है। सरकार ने 500 और 1000 के पुराने नोट लेने के लिए कुछ जरूरी संस्थानों पर 24 नवंबर तक छूट की हुई है। जिसके चलते सरकारी एजेंसियों व गांवों में स्थित सहकारी समितियों और सरकारी बीज बिक्री केंद्रों पर पुराने नोट चलाए जा रहे थे। 
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किसान जब केंद्रों पर बीज-खाद लेने पहुंच रहे हैं, तो केंद्रों ने पुराने नोट चलाने से मना कर दिया है। कारण यह था कि केंद्रों पर मंगलवार को रिजर्व बैंक का पत्र पहुंच गया था, जिसमें पुराने नोटों को लेने से मना कर दिया गया था। कई स्थानों पर तो किसानों ने हंगामा भी किया।  

किसानों का कहना था कि जब सरकार ने जरूरी सुविधाओं के लिए 24 नवंबर तक पुराने नोट चलाने की सीमा बढ़ा दी है तो सेवा केंद्र वाले क्यों मना कर रहे हैं।
 
-किसान के लिए खेती करना पहले से ही घाटे का सौदा बना हुआ है। भारी पेशानी व मेहनत के बाद भी किसान को उसकी उपज का सही मूल्य नहीं मिल पाता। ऐसे में रबी की फसल बुआई के समय पर नोटबंदी का फैंसला किसानों पर सर्जिकल स्ट्राइक जैसा है।

नोटबंदी पर जब पीएम को सुना था तो लगा था कि काला धन बाहर आएगा, लेकिन बैंकों के बाहर तो गरीबों की ही लाईन लगी है। 
-भगत सिंह घुघेरा, किसान नेता, भूडेर क्षेत्र। 
 
-इन दिनों फसल की बिजाई चल रही है और आढ़ती पुराने नोट दे रहे हैं, ऐसे में बीज व खाद के लिए नए नोट कहां से लेकर आएं। बैंकों में भीड़ के कारण पैसे बदले नहीं जा रहे हैं और बदले भी कम जा रहे हैं, जबकि खाद बीज के लिए ज्यादा रुपयों की जरूरत होती है।
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-भजन सिंह, किसान। 
                    
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