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होली पर पानी की बर्बादी रोकने के लिए आगे आ रहीं सामाजिक संस्थाएं

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Social organizations coming forward to stop wastage of water on Holi
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पलवल। ब्रज क्षेत्र से सटे पलवल जिले में होली के त्योहार पर चारों तरफ उल्लास का माहौल है। कुछ सालों पहले तो यहां होली खेलने के नाम पर कीचड़ तथा गोबर का भी जमकर इस्तेमाल होता था। गांवों में तो इसके बिना होली में मजा ही नहीं आता था, लेकिन समय के साथ-साथ यह सब खत्म हो गया। अभी भी होली खेलने के नाम पर कुछ स्थानों पर अनमोल पानी की बर्बादी जारी है। पहले रंग डालने और फिर रंग को छुड़ाने में जितने पानी की बर्बादी होती है, उससे काफी सूखे गलों को तर किया जा सकता है। वैसे भी जिले में भूजल स्तर तेजी से नीचे गिरता जा रहा है। लोगों के लिए पानी की किल्लत बढ़ती जा रही है। ऐसे में भावी पीढ़ी के सुरक्षित कल के लिए जल का संरक्षण बेहद जरूरी हो गया है। सामाजिक संस्थाओं द्वारा आयोजित किए जा रहे होली मंगल मिलन समारोह में भी सामाजिक संस्थाएं ‘जल बचाओ का संदेश’ देते हुए लोगों से रंग और गुलाल की बजाय फूलों की होली खेलने के लिए जागरूक कर रही हैं।
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ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 70 लीटर और शहरी क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति प्रतिदिन 135 लीटर पानी की आपूर्ति होती है। जिले की आबादी करीब 10 लाख से अधिक है। एक अनुमान के मुताबिक, प्रतिदिन करीब छह गैलन पानी की आपूर्ति की जरूरत है। होली पर तो यह खपत चार गुना तक बढ़ जाती है। जलस्तर गिरने से हर साल जन स्वास्थ्य विभाग द्वारा लगाए दर्जनों ट्यूबवेल पानी छोड़ जाते हैं। हथीन क्षेत्र के गांवों में तो पानी के लिए हर साल गर्मियों में हाहाकार मचा रहता है। रेनीवेल परियोजना पर सरकार द्वारा करोड़ों रुपये खर्च किए जाने के बावजूद पर्याप्त पानी नहीं मिल पता है। जलस्तर नीचे गिरने से किसानों के ट्यूबवेल ठप हो चुके हैं। कुछ क्षेत्रों में तो सिंचाई के लिए पानी न मिलने से सूखे जैसे हालात बने हुए हैं। बोतल बंद पानी पर लोगों की निर्भरता बढ़ती जा रही है। इन सभी को देखते हुए सामाजिक संस्थाओं द्वारा होली का पर्व नजदीक आते ही ‘जल बचाओ’ का संदेश देते हुए रंग और गुलाल से बचाव कर फूलों की होली खेलने का संदेश दिया जा रहा है।
यही कारण है कि पिछले कुछ वर्षों से जिले में फूलों की होली का विकल्प सामने आया है। होली मिलन कार्यक्रमों में तो ज्यादातर फूलों की ही होली खेली जाती है। इससे जहां पानी की बचत होती है, वहीं पुष्प उत्पादन को भी बढ़ावा मिलता है। इससे बहुत से किसानों को रोजगार भी मिलता है। इसके अलावा अच्छी गुणवत्ता वाले गुलाल और चंदन से सूखी होली खेलकर पानी की बचत की जा सकती है।
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रंग और गुलाल का प्रयोग कम करें
होली पर रंग और गुलाल का प्रयोग कम करें। जल की बर्बादी रोकें। पानी का इस्तेमाल न के बराबर ही करें, ताकि जल बचाया जा सके। इसके स्थान पर चंदन का टीका लगाएं तथा फूलों की होली खेलें। हरियाणा प्रदेश व्यापार मंडल द्वारा इसके लिए विशेष अभियान चलाया जा रहा है।
- प्रवीण गर्ग, प्रदेश संगठन मंत्री
रोटरी क्लब की तरफ से जिले के लोगों को ‘पानी बचाओ’ का संदेश दिया जा रहा है। संस्था के सदस्य लोगों को होली पर पानी बचाने के लिए रंग की बजाय फूलों की होली खेलने के लिए जागरूक कर रहे हैं। क्लब 17 मार्च को होली मिलन समारोह आयोजित किया जाएगा। इसमें फूलों व चंदन की होली खेली जाएगी।
-पराग चुटानी, अध्यक्ष रोटरी क्लब पलवल संस्कार
मानव सेवा समिति द्वारा पानी की बर्बादी रोकने के लिए लोगों को फूलों और चंदन की होली खेलने के लिए जागरूक किया जा रहा है। संस्था के होली मिलन समारोह में भी फूलों व चंदन का इस्तेमाल किया जाएगा। संस्था के सदस्य लोगों के बीच जाकर ‘पानी बचाओ’ का संदेश दे रही हैं।
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- सीता वर्मा, अध्यक्ष मानव सेवा समिति
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