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देश हुआ परदेस पर दिल में बसी राम की लीला

Wed, 25 Sep 2013 11:32 PM IST
भगत सिंह डागर
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देेश विभाजन के समय लोग अपना देश यानी पाकिस्तान तो छोड़ हिंदुस्तान आ गए लेकिन उनके जेहन में आज भी वहां होने वाली रामलीला की यादें बसीं हुई हैं।
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कुछ ऐसे ही लोग पलवल के जवाहर नगर कैंप में रहते हैं। उन्होंने आज भी अपनी उस कला को करीने से सजोये रखा है जिसे वे हर साल कैंप में होने वाली रामलीला में मंचन में करते हैं।


जवाहरनगर कैंप में रहने वाले पंजाबी समाज के लोग बताते हैं कि उस समय रामलीला के संवाद व चौपाई उर्दू में लिखे होते थे, जिसे हिंदुस्तान में हिंदी में लिखवाया गया। थोड़ी भाषा भी बदल गई। इस अद्भुत कला को देखने आज भी जिले और आसपास के लाखों लोग जुटते हैं।
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जवाहर नगर कैंप की प्राचीन आदर्श रामलीला में सीता, लक्ष्मण, अंगद, कुंभकरण, रावण, मंथरा, विश्वामित्र, शंकर भगवान सहित अन्य पात्रों का अभिनय कर चुके 75 वर्षीय पूर्व सैनिक वेद प्रकाश सेठी कहते हैं कि उन्होंने रामलीला में सभी प्रमुख किरदार निभाए हैं।

उन्होंने बताया कि देश विभाजन के बाद पाकिस्तान से हिंदू यहां आ गए और कैंप बस गया। यहां पंजाबी समाज के लोगों ने अपनी संस्कृति को रामलीला के माध्यम से आज भी जीवित रखा है।

उन्होंने बताया कि वहां से उर्दू में लिखे हुए रामलीला के संवाद व चौपाइयों के आधार पर 1954 में जवाहर नगर कैंप में रामलीला का पहली बार मंचन किया गया।
उसके बाद प्रति वर्ष वे फौज से छुट्टी लेकर रामलीला के समय यहां आते और विभिन्न पात्रों का किरदार निभाते थे। 1984 में वे फौज से रिटायर हो गए और तब से ही रामलीला का समय होते ही उनके मन में रामलीला में अभिनय करने की उमंगें उठने लगती हैं।
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अब बुजुर्ग होने के कारण कलाकारों को दिशा निर्देश देने के लिए रामलीला के मंच पर आ रहे हैं। उम्र ज्यादा होने के कारण सेठी साहब ने रामलीला से संयास ले लिया, लेकिन रामलीला की ललक आज भी उनके दिल में बरकरार है। अपने अनुभव के आधार पर वे अब भी नए कलाकारों को अभिनय में मार्ग दर्शन कराते हैं।
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