किसान और कृषि विभाग दोनों परेशानी में हैं। विभाग में अधिकारियों का अभाव है, जिससे किसानों को समय पर और जरूरत के मुताबिक तकनीकी जानकारी, बीज और सब्सिडी नहीं मिल पाती। ऐसे में जमीन की उर्वरा शक्ति और उपज दोनों घट रही है। जिले में करीब तीन लाख एकड़ कृषि योग्य जमीन है। खेती से हजारों किसान जुड़े हुए हैं, पर विभाग की ओर से समुचित सहायता नहीं मिल पाती। वजह है अधिकारियों की कमी और सरकार की उदासीनता।
यहां पलवल, पृथला, हथीन, होडल और हसनपुर कुल मिलाकर पांच खंड हैं। इनमें पांच खंड कृषि अधिकारी होने चाहिए, लेकिन हैं एक भी नहीं। इसी प्रकार 35 कृषि विकास अधिकारियों (एडीओ) की जगह सिर्फ दो अधिकारी मौजूद हैं। सामान्य नियम के मुताबिक दो से ढाई हजार हेक्टेयर जमीन के लिए एक एडीओ होना चाहिए।
उन्हीं के माध्यम से किसानों को समय पर बीज, सब्सिडी और कृषि की तकनीकी जानकारी मिल पाती है। किसान अधिकारियों से मुलाकात के लिए भटकते रहते हैं पर उनसे
मुलाकात कभी-कभार ही हो पाती है। जिले में जो अधिकारी हैं, उनका आधा समय तो मीटिंग में चला जाता है और बाकी समय एक खंड से दूसरे खंड में आने-जाने में निकल जाता है। किसान सुखबीर, किशनचंद, अजब सिंह आदि का कहना है कि अधिकारियों से मुलाकात के लिए चक्कर लगाना पड़ता है। ऐसे में वह कौन से बीज की बिजाई करें, कैसे बीज का उपचार करें और अनुदान का लाभ कैसे उठाएं, इसकी जानकारी समय पर नहीं मिल पाती।
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कम आया मूंग का बीज
- एक तरफ तो सरकार देश में दाल का आयात करती है दूसरी ओर उसकी उपज बढ़ाने के लिए बीज भी उपलब्ध नहीं करा पाती। वर्ष 2014 में कृषि विभाग की ओर से सात हजार एकड़ जमीन के लिए मूंग का बीज आया था। वर्ष 2015 में सिर्फ एक हजार एकड़ के लिए ही आया।
इस वर्ष तीन हजार एकड़ के लिए बीज आया है। बीज पर सरकार करीब 1900 रुपए प्रति प्रति एकड़ की छूट देती है, लेकिन बीज केवल इतनी मात्रा में आता है कि इससे किसानों में सिर-फुटव्वल की नौबत आ जाती है। दलहन की फसल से किसान को आमदनी तो होती ही है, इसके अलावा जमीन की उर्वरा शक्ति भी बढ़ती है। ऐसे में यदि समय पर जरूरत के मुताबिक किसानों को बीज ही नहीं उपलब्ध कराया जाएगा तो उपज और आमदनी कैसे होगी।
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बायोगैस प्लांट में भी अड़चन
- भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ाने और गोबर का सदुपयोग करने के लिए बायोगैस प्लांट (दो से छह क्यूबिक) लगाने पर सरकार की ओर से जोर दिया जाता है।
इसके कई फायदे हैं। इस पर नौ हजार रुपये की सब्सिडी भी दी जाती है। पर, इसके लगाने में आ रहे खर्च, लंबी प्रक्रिया और विभागीय अधिकारियों की कमी वजह से योजना ठीक ढंग से परवान नहीं चढ़ पाती।
किसानों का कहना है कि प्लांट लगाने में 18 से 20 हजार रुपये का खर्च आता है, लेकिन सब्सिडी राशि वर्षों बाद आती है। प्रशिक्षित मिस्त्री ही इसे लगा पाते हैं, जिसका खर्च भी करीब चार से पांच हजार रुपये बैठता है। इसके अलावा इसका वेरिफिकेशन और कुछ तय मानक भी हैं। सूत्रों की मानें तो कभी भी लक्ष्य को पूरा नहीं किया जा पाता है।