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होलिका पूजन कर महिलाओं ने मांगी परिवार की सुख-स्मृद्धि

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पलवल। धुलेंडी से पूर्व रविवार को जिले में होलिका पूजन किया गया। जिला के अंदर होलिका पूजन का उत्साह दिखाई दिया। हर तरफ महिलाओं द्वारा पूजन करने जाते समय गाए जा रहे लोकगीत व होली के रसिया सुनाई पड़ रहे थे। घरों से सज-धज कर निकली महिलाएं होलिका पूजन स्थल पर एकत्रित हुई और परंपरागत तरीके से होलिका का पूजन किया। महिलाओं के हाथों में गोबर से बनी बुरकलियां, नारियल व अन्य पूजा का सामान था।
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शहरों के अलावा गांवों में भी होलिका दहन स्थल पर महिलाओं की खासी भीड़ नजर आईं। महिलाओं ने होलिका व भक्त प्रहलाद को याद किया। सबसे ज्यादा रौनक पंचवटी चौक स्थित होली दहन स्थल पर रही, जहां महिलाओं ने होलिका पूजन कर परिक्रमा लगाई। होली चौक पर सुबह से ही महिलाएं पूजन के लिए निकलनी शुरू हो गई और ये सिलसिला दोपहर बाद तक चलता रहा। पूरे दिन यहां पर हजारों की संख्या में महिला पूजन करने के लिए आई। होलिका पूजन करने के लिए महिला होली वाले दिन व्रत रखती हैं और होलिका का पूजन करने के लिए हल्दी, गुड़, जौ की बाली और गोबर से बनी हुई बुरकली लेकर आती हैं। होली को लेकर 10 दिन पहले से बुरकली थापना महिला शुरू कर देती है। होलिका पूजन में जौ की बालियों से इसलिए पूजा की जाती है, क्योंकि अब रबी की फसल पूरी तरह से पक चुकी है। होली चौक के अलावा झाबर नगर, खोंटा मंदिर, दयानंद स्कूल के समीप अन्य स्थानों पर होलिका पूजन हुआ।
लकड़ियों व उपलों से बनाया गया प्रतीक
जिले में कीकरों की ढांकरों व लकड़ियों से होलिका का प्रतीक बनाया गया था। उनके चारों तरफ उपला लगाए हुए थे। इन्हीं पूजा स्थलों पर पूजन करने आई महिलाओं ने घर से लाई गोबर की बुरकलियां चढ़ाईं, देर रात को होलिका दहन किया गया। शाम होते-होते होलिका दहन स्थलों पर नगाड़ों को लेकर पुरुषों की टोलियां रसिया व चौपाई गाते हुए पहुंचे। मंत्रोच्चारण के बीच होलिका दहन किया गया तथा गेहूं की बालियां भूनी गईं। एक दूसरे को भुने हुए गेहूं भेंट करते हुए होली की बधाई भी दी गई। इसके बाद विभिन्न चौपालों पर होली के रसिया व चौपाई गायन के कार्यक्रम हुए। देर तक नृत्य भी चलता रहा।
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