विधानसभा के 21 अक्टूबर को होने वाले चुनावों में यह पहला मौका है,जब पलवल विधानसभा क्षेत्र में किसी राष्ट्रीय राजनीतिक दल के प्रत्याशी का नामांकन रद्द हुआ है। वह भी उस राजनीतिक दल के प्रत्याशी का जिसका बेशक यहां से आज तक कोई भी विधायक नहीं बना, लेकिन विधायक बनाने में अहम भूमिका निभाता रहा है।
पलवल विधानसभा क्षेत्र से बसपा प्रत्याशी देवेंद्र गुर्जर का नामांकन पत्रों की जांच के दौरान पाई गई कमियां मिली, जिस कारण नामांकन रद्द कर दिया गया। बसपा प्रत्याशी के अलावा निर्वाचन अधिकारी द्वारा जारी की गई नामांकन पत्रों की जांच रिपोर्ट में 3 प्रत्याशियों के नामांकन भी रद्द किए गए हैं।
बसपा प्रत्याशी ने नामांकन पत्र के साथ शपथ पत्र नहीं लगाया था। देवेंद्र गुर्जर का नामांकन रद्द होने के बाद पहला मौका है, जब बसपा पलवल विधानसभा क्षेत्र से चुनाव नहीं लड़ेगी। इनके अलावा कांग्रेस, भाजपा और इनेलो से कवरिंग प्रत्याशी के रूप में भरे गए नामांकन भी रद्द किए गए हैं।
पंजाब से अलग होकर हरियाणा के गठन के बाद अब तक 13 विधानसभा चुनाव हो चुके हैं। पलवल में 13 विधानसभा चुनावों के अलावा दो बार उपचुनाव भी हुए हैं। जिनमें बसपा का गठन होने के से लेकर 2014 तक पलवल से बसपा की टिकट पर किसी न किसी ने चुनाव लड़ा है।
जब भी बसपा की टिकट पर किसी ने चुनाव लड़ा है तो उस प्रत्याशी ने 8 से 10 हजार वोट हासिल की है। बल्कि इस बार लोकसभा चुनाव 2019 में पलवल विधानसभा क्षेत्र में बसपा प्रत्याशी को 14 हजार के करीब मत मिले हैं। ऐसे में बसपा प्रत्याशी चुनाव के दौरान हारजीत का फैसला करने में निर्णायक भूूमिका निभाता है।
कांग्रेस को मिल सकता है फायदा
पलवल विधानसभा क्षेत्र में इस बार बसपा का प्रत्याशी नहीं होने का फायदा कांग्रेस को मिल सकता है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि बसपा का वोटर खासकर दलित समाज से है और दलित बसपा के अलावा कांग्रेस को अपना वोट करता है। इस बार बसपा का पलवल से कोई प्रत्याशी नहीं होने के कारण दलित समाज का वोटर कांग्रेस की तरफ जा सकता है। दूसरा होडल से कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ रहे उदयभान का भी दलित समाज में विशेष प्रभाव है। राजनीतिक जानकारों का कहना है कि उदयभान को दलित समाज के लोग अपना इमाम मानते हैं, ऐसे में उदयभान का कांग्रेस प्रत्याशी होने के कारण कांग्रेस प्रत्याशी करण सिंह दलाल को खुला समर्थन है।