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गांव के आइसोलेशन सेंटरः दावे बड़े, हकीकत जीरो

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नारनौल। जिले में प्रशासन की और से बनाए गए आइसोलेशन सेंटर का मुख्य उद्देश्य था कि कोरोना संक्रमितों को घरों मे रखने के बजाय इन आइसोलेशन सेंटर पर रखा जाए जिससे संक्रमण परिवार के दूसरे लोगों में न फैले। अमर उजाला टीम ने इन सेंटरों की पड़ताल की तो पाया की सुविधा के नाम पर इस सेंटरों पर कुछ भी नही है। इसीलिए लोग इन सेंटरों पर आने से कतरा रहे हैं। इस समय भी जिले में लगभग 60 लोग आइसोलेट हैं पर सभी घरों में ही हैं। जिले के लगभग सभी आइसोलेशन सेंटर खाली पड़े हैं।
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कोरोना की दूसरी लहर में कोरोना पर काबू पाने के लिए प्रशासन ने संक्रमितों को आइसोलेशन सेंटर में रखने का निर्णय लिया था। इसका मुख्य उद्देश्य यही था कि संक्रमण की चेन को तोड़ा जा सके। अगर मरीज घर पर रहेगा तो दूसरे लोगों को भी संक्रमण का भय रहेगा। इसके लिए आइसोलेशन सेंटर बनाए गए। मगर इन आइसोलेशन सेंटर में बेड के तौर पर गांव से एकत्रित किए तख्त व खाट लगाई गई। न बिजली की सुविधा और न ही कोई दूसरी।
इन सेंटरो पर ऑक्सीजन, दवाइयां, मास्क, सैनिटाइजर उपलब्ध करवाने के दावे किए गए। चिकित्सक भी न के बराबर थे। किसी भी सेंटर पर ऑक्सीजन कंसंट्रेटर नहीं है। जिसके कारण इन सेंटरों पर कोई भी कोरोना का मरीज नहीं है। आइसोलेशन सेंटर पर तीन कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई है। आइसोलेशन सेंटर पर तैनात जेबीटी शिक्षक ने बताया की कोरोना मरीज अगर सेंटर पर आ गया तो हमारे पास सुविधा के नाम पर कुछ भी उपकरण नहीं है। लेकिन ड्यूटी करना मजबूरी है। वहीं तीन कर्मचारियों की ड्यूटी गांव में घर-घर जाकर लोगों का रूटीन चेकअप करने की ड्यूटी लगा रखी है। लेकिन बुखार, खांसी के लोग दवाई लेकर अपने घर पर रहना चाहते हैं। जिसके चलते गांव में बने आइसोलेशन सेंटर खाली पड़े हैं।
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