नारनौल। दिवाली का त्योहार क्षेत्र में धूमधाम से मनाया जाता है। इस समय बाजार में रौनक छाई हुई है। वहीं समय के साथ-साथ त्योहार को मनाने के तरीके में भी परिवर्तन देखने को मिला है। बुजुर्गों का कहना है कि पुराने समय में पक्के मकान की तुलना में कच्चे मकान अधिक होते थे। वहीं दिवाली पर उन पर गोबर का लेप किया जाता था और चित्रकारी बनाते थे। दिवाली के अवसर पर करीब एक महीने पहले घर और दुकानों की सफाई का कार्य शुरू कर दिया जाता था। दिवाली पर बाजार की बजाय घर में ही मिठाइयां बनाई जाती थी। पुराने समय में दिवाली मनाने के तौर-तरीको के बारे में अमर उजाला टीम ने बुजुर्गों से खास बातचीत की।
मेरी उम्र 65 वर्ष है और आज के समय व पहले के समय में बहुत ज्यादा परिवर्तन हुआ है। पुराने समय में लोगों के पास पैसे नहीं थे लेकिन आपस में प्रेम बहुत था। मुझे अच्छे से याद है कि मेरे बचपन में हमारे मोहल्ले में अधिकतर घर कच्चे थे। दिवाली के समय मोहल्ले के सभी लोग घरों में गोबर का लेप करते थे और दीवारों पर चित्रकला करते थे। मोहल्ले में कुछ हवेली भी बनी हुई थी, जिनमें कली करने का कार्य किया जाता था। रंग रोगन का काम घर के सदस्य ही करते थे। अगर ईमानदारी से कहूं तो त्योहार मनाने के संसाधन बेशक कम थे, मगर आपसी प्रेम और सौहार्द भरपूर था।
करतार सिंह, मोहल्ला-सीआईए रोड, नारनौल।
समय के साथ परिवर्तन होना स्वाभाविक है। पुराने समय में संयुक्त परिवार होते थे। अगर परिवार का कोई सदस्य दूसरे शहर में नौकरी या व्यापार करता था तो दिवाली पर घर जरूर आते थे। वहीं पूरा परिवार साथ मिलकर दिवाली मनाता था। घर की महिलाएं मिलकर खीर, हलवा, जलेबी और इमरती इत्यादि मिठाइयां घर पर ही बनाती थी। आज के समय में संयुक्त परिवार का महत्व नहीं रह गया है। माता-पिता अलग और बच्चे अलग दिवाली का पूजन करते हैं। जिस कारण अब पर्व पर आतिशबाजी तो पहले से ज्यादा होती है लेकिन खुशियों में कमियां आई है।
धर्मबीर सिंह, दया नगर, नारनौल
पुराने समय में लोगों के पास पैसे नहीं होते थे और जीवन यापन के लिए कृषि पर निर्भर थे। दीपावली से पहले किसान फसल बेचते थे और उससे प्राप्त होने वाले पैसों से अपनी जरूरतों को पूरा करते थे। व्यापार भी उसी पर आधारित था क्योंकि किसान फसल बेचकर पैसे प्राप्त करते थे। इसलिए सब लोग दिवाली के त्योहार का बेसब्री से इंतजार करते थे।
उमराव, दुकानदार, बहादुर सिंह तालाब, नारनौल।