फोटो नंबर-04भागवत कथा के दौरान निकाली गई झांकी के साथ आचार्य। स्रोत-आयोजक
नारनौल। गांव भूषण कलां में चल रही श्रीमद्भागवत कथा के तीसरे दिन शनिवार को आचार्य बजरंग शास्त्री ने सती और ध्रुव की कथा सुनाई। सती चरित्र का वर्णन करते हुए कहा कि जहां अपमान और अनादर की भावना हो वहां बिना बुलाए नहीं जाना चाहिए।
माता सती बिना आमंत्रण के अपने पिता दक्ष के यज्ञ में पहुंचीं, जहां भगवान शंकर और स्वयं उनका अपमान हुआ। इससे व्यथित होकर उन्होंने अपने शरीर का त्याग कर दिया।
आचार्य ने कहा कि मनुष्य को गृहस्थ जीवन के साथ-साथ प्रभु स्मरण और पुण्य कर्म करते रहना चाहिए। धन्य वह व्यक्ति है जो स्वयं प्रभु का नाम लेता है और दूसरों को भी उसका स्मरण कराता है। मृत्यु के बाद मनुष्य के साथ केवल उसके कर्म, भजन और चरित्र ही जाते हैं।
इसलिए हर व्यक्ति को अपने कर्मों से समाज और दूसरों का भला करने का प्रयास करना चाहिए। कथा के अंत में आचार्य जी ने ध्रुव चरित्र का अत्यंत मार्मिक वर्णन किया, जिसे सुनकर श्रोता भावविभोर हो गए।
इस अवसर पर मुख्य यजमान मदनलाल जसोरिया व मंजू जसोरिया, विकास जसोरिया, विशाल जसोरिया, घनश्याम जसोरिया, मयंक सैन, जतिन, पं. लक्ष्मण शर्मा, पं. विकास शर्मा, रामगोपाल दुबे, अभय शर्मा व जितेंद्र शर्मा मौजूद रहे।