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Mahendragarh-Narnaul News: विभाजन की विभीषिका में शरणस्थली बनीं संघीवाड़ा की हवेलियां

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नारनौल। शहर की पुरानी गलियों में आज भी इतिहास सांस लेता है। संघीवाड़ा मोहल्ले की हवेलियां केवल स्थापत्य की पहचान नहीं, बल्कि उन दिनों की गवाह हैं जब देश आजादी की दहलीज पर था और 1947 का विभाजन लोगों के लिए भय, विस्थापन और असुरक्षा का दौर लेकर आया था। इन हवेलियों से जुड़ी स्मृतियां उस दौर की मानवीय संवेदना और सामाजिक एकजुटता की कहानी सामने लाती हैं।
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इंटेक्स कन्वीनर सोमप्रकाश अग्रवाल के अनुसार, संघीवाड़ा की नौ चौक हवेली का निर्माण हरबकख्शलाल लाल संघी ने करवाया था। हवेली में नौ चौक और दो दरवाजे हैं। आजादी से पहले यहां लोगों की समस्याएं सुनी जाती थीं। हरबकख्शलाल लाल संघी नवाब झज्जर के दीवान थे और हवेली में कचहरी लगाया करते थे। वे सामाजिक गतिविधियों के साथ स्वतंत्रता आंदोलन से भी जुड़े रहे।
वर्ष 1947 में विभाजन के दौरान जब क्षेत्र में तनाव और हिंसा का माहौल बना, तब नौ चौक हवेली हिंदू परिवारों के लिए शरणस्थली बन गई। बताया जाता है कि यहां लोगों को आश्रय दिया गया और मोर्चे पर डटे लोगों के लिए भोजन तैयार कर भेजा जाता था। इस तरह हवेली ने संकट के समय केवल एक इमारत नहीं, बल्कि सुरक्षा और सहयोग के केंद्र की भूमिका निभाई।
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संघीवाड़ा की खिरनी वाली हवेली भी स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों से जुड़ी है। स्थानीय लोगों के अनुसार, लाला शंकरलाल संघी नेताजी सुभाषचंद्र बोस के साथ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय रहे थे। यह भी बताया जाता है कि काबुल जाते समय नेताजी यहां रुके थे। हवेली में आज भी सत्यवती माता का मंदिर मौजूद है। आज समय के साथ इन हवेलियों का स्वरूप बदल रहा है।
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