नारनौल। गांव रामपुरा नावदी में 15 अगस्त 1977 को एक किसान परिवार में जन्मी संतोष बाई का जीवन संघर्ष भरा रहा। मात्र 20 वर्ष की उम्र में शादी के बाद वे गांव शोभापुर आ गईं। उस समय उन्होंने केवल 12वीं तक पढ़ाई की थी और जीवन की जिम्मेदारियां उनके सामने चुनौती बनकर खड़ी थीं।
संतोष के पति पढ़ाई के साथ-साथ तूड़ा बेचकर घर चलाते थे। ऐसे समय में सास और पति के सहयोग से उन्होंने महिला आईटीआई में दाखिला लिया। घर, खेत, पशु और परिवार की जिम्मेदारियां निभाते हुए उन्होंने रात में पढ़ाई जारी रखी।
इसका परिणाम यह हुआ कि उन्होंने 1999 में सिलाई और 2000 में कढ़ाई का प्रशिक्षण पूरा किया। इसके बाद 2002 में टीचर ट्रेनिंग कोर्स (टीटीसी) भी सफलतापूर्वक पूरा किया।
संतोष ने 2000 से 2002 के बीच गांव शोभापुर, भूषण खुर्द और भूषण कला में चल रहे सिलाई प्रशिक्षण शिविरों में महिलाओं को प्रशिक्षण दिया। इस दौरान उन्हें 1800 रुपये मासिक मानदेय भी मिलता था। घर की जिम्मेदारियों के साथ-साथ उन्होंने महिलाओं के कपड़े सिलकर भी परिवार का सहयोग किया।
2007 में उन्हें रेवाड़ी में अनुदेशिका के रूप में नौकरी मिली, जहां उन्होंने 7 साल सेवा दी। 2014 से वे नारनौल की महिला आईटीआई में कार्यरत हैं और आज वहीं छात्राओं का भविष्य संवार रही हैं जहां कभी उन्होंने खुद सीखने का सफर शुरू किया था।
उनके पति की नौकरी 2012 में पंचकूला कोर्ट में लिपिक के पद पर लगी, यानी जीवन में दोनों ने मेहनत से सफलता हासिल की। संतोष आज भी अपने संघर्ष की कहानी छात्राओं को सुनाती हैं ताकि वे भी मेहनत और लगन से आगे बढ़ सकें। उन्होंने ट्रैक्टर चलाकर खेतों में भी पति का हाथ बंटाया और हर चुनौती को अवसर में बदला।