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सुदामा किसी से कुछ नहीं मांगते थे : रामप्रपन्नाचार्य

Sat, 09 Aug 2025 12:41 AM IST
रोहतक ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, महेंद्रगढ़/नारनौल
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महेंद्रगढ़। श्री सतगुरु सेवा समिति महेंद्रगढ़ के तत्वावधान में रामलीला परिषद परिसर में आयोजित श्रीमद्भागवत सप्ताह ज्ञान यज्ञ के दौरान सातवें दिन वृंदावन से आए संत प्रवर स्वामी श्री रामप्रपन्नाचार्य ने उधव गोपी सेवा, रुक्मिणी मंगल, सुदामा चरित्र की कथा सुनाई।
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उन्होंने बताया कि विप्रवर सुदामा अपने जीवन में बहुत गरीब थे। विवाह करके उन्होंने भी गृहस्थ आश्रम स्वीकार किया। एक टूटी झोपड़ी, टूटे-फूटे दो-चार पात्र और ढकने को कुछ मैले वस्त्र-बस, इतनी ही गृहस्थी थी सुदामा की। सुदामा बड़े सादे और संतोषपूर्ण व्यक्ति थे। वे किसी से कुछ मांगने वाले नहीं थे। जो कुछ बिना मांगे मिल जाता उसी से अपना जीवन निर्वाह करते थे।
सुदामा लोगो से पूछते जब वे श्रीकृष्ण का पता पूछते पूछते वे श्री कृष्ण के राज दरबार के द्वार पहुंचे तो ऐसे कंगाल, चीथड़े लपेटे, मैले-कुचैले ब्राह्मण को देखकर द्वारपाल को आश्चर्य हुआ। जब सुदामा ने अपने को भगवान का मित्र बताया तब वह चकित रह गए। द्वारपाल ने भगवान को प्रणाम करके कहा एक बहुत ही दुर्बल ब्राह्मण द्वार पर खड़ा है, जिसके शरीर पर मैला-कुचैला वस्त्र है और जो नंगे सिर और नंगे बदन के साथ द्वार पर खड़ा है वहां है। अपने को आपका का मित्र सुदामा बताता है। उन्होंने दोनों हाथ फैलाए और अपने मित्र सुदामा को अपने गले से लगा लिया और सुदामा को आंखों से अश्रुप्रवाह करते हुए देखा। जब वे अपने मित्र भगवान कृष्ण से मिलकर खाली हाथ लौटे, तो उन्हें इसकी चिंता नहीं थी। भगवान ने विश्वकर्मा को भेजकर उनके गांव को द्वारका जैसा महान शहर बना दिया।
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