कपास खरीफ सीजन की एक बहुत ही महत्वपूर्ण एवं नकदी फसल है। जिला में लगभग 50 हजार एकड़ में कपास फसल की बिजाई की जाती है। कुछ वर्षों से विभिन्न क्षेत्रों में गुलाबी सुंडी का प्रकोप देखा गया है। इससे फसल को काफी नुकसान होता है, इसलिए इसकी रोकथाम बहुत जरूरी है।
उपायुक्त डाॅ. विवेक भारती ने बताया कि गुलाबी सुंडी की रोकथाम के लिए जरूरी है कि हम इसके जीवन चक्र को समझें और इसके जीवन चक्कर में आने वाले इसकी अनुकूल क्रियाओं को अवरुद्ध करें ताकि इस किट के आने से पहले ही रोकथाम की जा सके। उन्होंने बताया कि गुलाबी सुंडी सिर्फ कपास फसल को ही खाती है इसको मोनोफैगस भी कहते हैं। उप कृषि निदेशक डाॅ. देवेंद्र सिंह ने बताया कि कपास की बिजाई 15 अप्रैल से जून के पहले सप्ताह तक की जा सकती है परंतु मई का महीना कपास की बिजाई के लिए सर्वोत्तम है।
उन्होंने बताया कि महेंद्रगढ़, भिवानी तथा डबवाली (सिरसा) जिलों में जहां मिट्टी रेतीली है और तेज हवाओं से पौधे जलने तथा रेत में दबने की संभावना होती है। इसलिए इन जिलों में अप्रैल के पहले पखवाड़े में बिजाई कर लेनी चाहिए। बीटी कपास की बिजाई का सर्वोत्तम समय अप्रैल के तीसरे सप्ताह से लेकर मई के अंत तक है। उन्होंने बताया कि गुलाबी सुंडी के लार्वा गत वर्ष की कपास फसल के अवशेष, अनखिले, अधखिले टिंडों एवं खोखड़ियों में छिपे रह जाते हैं इसलिए किसान कपास की फसल लेने के बाद खेतों में भेड़ बकरियों व पशुओं को खिलाए ताकि पौधों पर लगे अधखिले तथा अनखिले टिंडों, अन्य फलीय भागों एवं कचरे को ये जानवर खाकर नष्ट कर दें।
गुलाबी सुंडी का प्रकोप कम करने के लिए क्या करें
सहायक पौधा संरक्षण अधिकारी डाॅ. हरपाल सिंह ने बताया कि कटाई के बाद आने वाली कपास फसल में गुलाबी सुंडी का प्रकोप कम करने के लिए फसल कटाई के तुरंत बाद भेड़ बकरियों को खाने दें। अंतिम चुगाई के बाद लकड़ियों को जमीन में मिलाएं।