महर्षि च्यवन की तपोभूमि, शेरशाह सूरी की क्रिड़ास्थली, अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल की कर्मस्थली व संत कवि नित्यानंद की जन्मस्थली रहे नारनौल के प्राचीन भवन और सरोवर वैभवपूर्ण अतीत को बखूबी ब्यान करते हैं। यहां पर मुगलकालीन अनेक इमारतें हैं, जो अब जर्जर हालत में होती जा रही हैं। ऐसे में अगर इनकी थोड़ी देखभाल कर पर्यटकों को लाया जाए तो नारनौल शहर पर्यटन का अच्छा केंद्र बन सकता है। तत्कालीन पर्यटन मंत्री किरण चौधरी के समय पहल भी की गई तथा पीपीपी (पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशीप) के तहत यहां जर्मन पर्यटनों को लाया भी गया। जिन्हें नारनौल खूब भाया, मगर अब एक साल से फिर से यहां पर्यटक आने की गतिविधियों को विराम लगा हुआ है।
दिल्ली से बीकानेर जाने के लिए विदेशी पर्यटन नारनौल होकर निकलते हैं। विभिन्न ट्रेवल एजेंसी वाले इन पर्यटकों को नारनौल के बाजार भी घुमाते हैं, मगर शहर के विभिन्न पर्यटन स्थलों पर वे इनको नहीं ले जा पाते। क्योंकि वहां तक जाने आने में समय लगता है तथा रोड भी ठीक नहीं हैं। 2011-12 में यहां के एक रिसोर्ट के मालिक सम्राट नरुला ने इसके लिए पहल की तथा जर्मन की मार्को पोलो ट्रेवल एजेंसी से संपर्क कर यहां जर्मन पर्यटकों को घुमाया। जर्मन पर्यटकों को यहां के जलमहल सहित अन्य इमारतें दिखाई गई, जो उनको बहुत पसंद आई। इस तरह 2014 तक जर्मन पर्यटकों के आठ से दस दल आए। मगर अब फिर यहां पर पर्यटक आने एक साल से बंद हैं। अगर सरकार इस दिशा में पहल करे तो यहां के विभिन्न ऐतिहासिक स्थलों का रखरखाव कर तथा रोडों को ठीक कर विदेशी पर्यटकों को लाया जा सकता है।
क्या हैं नारनौल में घूमने के लिए
प्रदेश के किसी भी एक शहर में सर्वाधिक ऐतिहासिी स्मारक होने का गौरव नारनौल को ही हासिल है। यहां के ऐतिहासिक स्मारक अपने कलात्मक सौंदर्य, स्थापत्य कला, ऐतिहासिक सहाक्ष्यों और सांस्कृतिक धरोहर के रूप में नायाब हैं। इनमें प्राचीन काल की उच्च कोटी की स्थापत्यकला का अनोखा समावेश है। यहां के कुल 14 ऐतिहासिक स्मारकों में से 3 केंद्रीय पुरातत्व तथा शेष 11 हरियाणा राज्य पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित हैं। यहां के प्रमुख स्मारकों में सम्राट शेरशाह सूरी द्वारा निर्मित उनके दादा इब्राहिम खान का मकबरा, जल महल, शाहकुली खान का मकबरा, राय बालमुकुन्द का छत्ता जिसे बीरबल का छत्ता के नाम से जाना जाता है, तख्त वाली बावड़ी, चोर गुम्बद और शेख मिहिंरा की दरगाह आदि शामिल हैं। इनके अतिरिक्त यहां का चामुंडा देवी मंदिर भी ऐतिहासिक है। महर्षि च्यवन की तपोभूमि ढोसी और महेंद्रगढ़ में माधोगढ़ का ऐतिहासिक किला भी इसी जिले की सीमा में आते हैं।
जल महल
नारनौल शहर के दक्षिण में आबादी से बाहर एक विशाल तालाब, जिसे खान तालाब कहा जाता है के बीच बना है प्रसिद्ध जलमहल। जिसे 1591 ई. में यहां के जागीरदार शाहकुली खान ने बनवाया था। महल के ऊपर पांच छतरियां बनी हुई हैं। महल तक पहुंचने के लिए मेहराब दार पुल बना हुआ है।
चोर गुंबद
शहर के उत्तरी-पश्चिमी दिशा में एक ऊंचाई वाले स्थान पर बना एक ऐतिहासिक स्मारक है-चोरगुंबद। इसका निर्माण जमाल खां नामक पठान ने अपने मकबरे के रूप में करवाया था। किंतु ऐसी मान्यता है कि नगर से बाहर होने के कारण यह चोरों का आश्रय स्थल बन गया था। इसलिए इसका नाम चोर गुम्बद पड़ गया। यह एक विशाल गोलाकार गुम्बद है जिसकी छत को गोलाकार देकर बहुत ऊंचाई तक उठाया गया है। देखने में दो मंजिला भवन है, मगर ऊपरी मंजिल केवल बरामदा है, जिसके बीस द्वार हैं।
इब्राहिम खान का मकबरा
यह जिला शेरशाह सूरी की क्रिड़ास्थली रहा है। सम्राट शेरशाह सूरी ने नगर के दक्षिण-पश्चिम भाग में अपने दादा इब्राहिम खान के मकबरे का निर्माण करवाया था जो स्थापत्य कला के हिसाब से यहां के सभी स्मारकों से उत्तम है। अब शहर के बीच आ जाने से यहां तक पहुंचना कुछ मुश्किल हो गया है। इसमें लाल पत्थर और सफेद संगमरमर का प्रयोग किया गया है। विशालकाय मकबरा आज भी अच्छी स्थिति में है और सूरी वंश की स्थापत्यकला का जीता-जागता नमूना है।
बीरबल का छत्ता
राय बालमुकुंद द्वारा बनवाया गया छत्ता शहर के बीच में स्थित है। इसे बीरबल के छत्ते के नाम से जाना जाता है। ऐसी मान्यता है कि अकबर के नवरत्नों में से एक बीरबल राजकाज के सिलसिले में यहां आते थे और इस छत्ते में रहते थे। इसलिए इसका नाम बीरबल का छत्ता पड़ गया। यह दो मंजिला भवन बनावट में किले और महल का समिश्रण नजर आता है। मरम्मत और उचित रखरखाव के अभाव में अब यह तिल-तिल कर नष्ट हो रहा है।
ढोसी पर्वत
नारनौल से लगभग दस किलोमीटर दूर अरावली पर्वत श्रंखला की ढोसी पहाड़ी है जो महर्षि च्यवन की तपोभूमि और पवित्र तीर्थ स्थल है। पौराणिक कथा के अनुसार इस तीर्थ का संबंध द्वापर युग से है। किवदंति है कि यहां महर्षि च्यवन ने सात हजार साल तपस्या की थी। महर्षि ने इस क्षेत्र में पाई जाने वाली जड़ीबूटियों से औषध तैयार की थी जिसे आज भी च्यवनप्राश के नाम से जाना जाता है।
ग्रांट आई, मगर नहीं हो रहा काम
प्राचीन ऐतिहासिक इमारतों के रख-रखाव के बारे में सुपरविजन का काम कर रही इंटेक के जिला को-कन्विनर सोमप्रकाश अग्रवाल ने बताया कि बीरबल के छत्ते की मरम्मत के लिए एक करोड़ रुपये की ग्रांट एएसआई एस्ट्रोजिकल सर्वे आफ इंडिया ने तीन साल पहले दी थी, मगर उस पर करीब 20 लाख रुपये ही खर्च हुए। ठेकेदार द्वारा सही काम न करने पर इसको रोक दिया गया। इस पर अब काम नहीं हो रहा, जो जल्दी होना चाहिए।
शहर में जहां-जहां पर्यटन स्थलों के रखरखाव या मरम्मत की आवश्यकता होगी, वहां-वहां उन पर्यटन स्थलों की मरम्मत का काम करवाया जाएगा। शहर को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया जा सकता है। इसके लिए सरकार व प्रशासन प्रयास कर रहा है।---राजनारायण कौशिक, उपायुक्त