नारनौल। एक-एक पैसे की कीमत शायद उन लोगों से बेहतर कोई नहीं समझ सकता जो 200 रुपये अतिरिक्त दिहाड़ी के लिए अपने परिवार से दूर दिन काट रहें हैं। राजस्थान के कई गांवों के लोग अपने बच्चों को अच्छा भविष्य देने के लिए उनसे दूर 15 सालों से नारनौल में काम कर रहे हैं।
इसे अब लालच कहें या मजबूरी लेकिन जो भी हो बच्चों को कामयाब बनाने के लिए मां बाप कहीं भी काम करते हैं, ताकि जो दिन उन्होंने देखे वे उनके बच्चों का न देखने पड़ें।
कई परिवारों को तिरपाल का सहारा
रात का रिपोर्टर बनकर टीम जब इन मजदूरों के पास पहुंची तो सोवनी देवी चूल्हे पर खाना पका रही थी और पति गोवर्घन चूल्हे के पास बैठे हाथ सेंक रहे थे। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया कि वह और उनकी पत्नी दोनों ही दिहाड़ी मजदूरी का काम करते हैं और उनके अलावा यहां टोंक जिले के अलग-अलग गांवों के करीब 16 परिवार और भी हैं जो पिछले 15 सालों से यहां गुजर बसर कर रहे हैं।
न पानी न बिजली, बस चल रहा है गुजारा
कोर्ट के समीप चकबंदी कार्यालय के पास खाली पड़ी जमीन पर ये सभी परिवार इन सर्द दिनों में केवल तिरपाल के सहारे रात गुजार रहे हैं। इनके पास न बिजली है और न ही पानी की कोई सुविधा। पानी की साथ में बने पार्क से व्यवस्था हो जाती है और काम से लौटते समय जगह जगह से सूखी लकड़ी बीन कर रात के भोजन की व्यवस्था करनी पड़ती है। रात को जो पकता है उसे ही सुबह खा कर अपने काम पर निकल जाते हैं।
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मैं टोंक जिले की रहने वाली हूं, हमारे क्षेत्र में निर्माण भी कम है व दिहाड़ी भी। इसलिए नारनौल आकर मजदूरी कर रहे हैं। यहां भी कई दिन बिना काम के गुजर जाते हैं।-मनफूल, मजदूर
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मेरा बेटा अभी 4 माह का है। मैं और मेरे पति अपने बच्चे को बेहतर जीवन देने के लिए घर से करीब 300 किमी दूर मजदूरी कर रहे हैं। हमारा लक्ष्य है कि बच्चे को पढ़ा-लिखा कर सफल व्यक्ति बनाएं ताकि परिवार के साथ-साथ हमारे क्षेत्र के अन्य लोगों की स्थिति में भी सुधार हो सकें।-सोनिया, दिहाड़ी मजदूर