फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Mahendragarh-Narnaul News: सुबह खत मिला...लिखा था-अगले हफ्ते घर आऊंगा दोपहर बाद हमेशा के लिए बिछड़ने की खबर आई

विज्ञापन
फोटो संख्या:73- शहीद सिपाही लालाराम--फाइल फोटो
विज्ञापन
शौर्यगाथा वीरांगनाओं की
विज्ञापन

इंद्रजीत शर्मा
कनीना (महेंद्रगढ़)। 13 कुमाऊं रेजिमेंट में सिपाही रहे सिहोर गांव के लालाराम 21 जुलाई 1994 को जम्मू-कश्मीर में चलाए गए ऑपरेशन रक्षक में बलिदान हो गए थे। शहादत से चंद घंटे पहले पत्नी राजेश देवी को लालाराम का भेजा खत मिला था। इसमें लिखा था- मेरी छुट्टी मंजूर हो गई है। एक सप्ताह में घर आऊंगा। बच्चों के लिए कपड़े और तुम्हारे लिए साड़ी ली है। यह खबर पढ़कर राजेश देवी की खुशी का ठिकाना नहीं था। वह पति के घर आने की घड़ियां गिन रही थीं कि दोपहर बाद हमेशा के लिए बिछड़ने की खबर आ गई।
वीरांगना राजेश देवी बताती हैं उनके पति लालाराम 20 जून 1980 को 13 कुमांऊ रेजिमेंट रानीखेत में सिपाही भर्ती हुए थे। साल 1982 में उनकी शादी हुई थी। 21 जुलाई 1994 को भारतीय सेना ने जम्मू-कश्मीर में ऑपरेशन रक्षक चलाया था। इस दौरान आतंकियों ने उनके पति लालाराम के माथे पर गोलियां मार दी थीं।
विज्ञापन

पति की शहादत के बाद राजेश देवी ने तीन दिन तक खाना नहीं खाया। वह बार-बार बेसुध हो जाती थीं। परिवारीजनों ने जबरदस्ती उनका जबड़ा खोला तो उनके तीन-चार दांत टूट गए। पूरा मुंह लहूलुहान हो गया था। लालाराम जब बलिदान हुए तब बड़ा बेटा अजय 8 और छोटा बेटा जितेंद्र 6 साल का था।
पिता के नक्शेकदम पर चलकर दोनों बेटों ने सेना में दीं सेवाएं
राजेश देवी बताती हैं सीमित संसाधन और महज एक एकड़ जमीन में काफी मुश्किलों से दोनों बेटों की परवरिश की। परिवार ने सहयोग किया तो खेती-किसानी कर बच्चों को जैसे-तैसे पाल पोसकर बड़ा किया। बड़ा बेटा अजय बीए करने के बाद साल 2003 में 16 कुमांऊ रेजिमेंट रानीखेत में सिपाही भर्ती हुआ। साल 2010 में परिवारिक जिम्मेदारियों के चलते उसने वीआरएस ले ली। छोटा बेटा जितेंद्र 10वीं पास कर नवंबर 2005 में 13 कुमांऊ रेजिमेंट में भर्ती हुआ था। वह दिसंबर 2023 में सेवानिवृत्त हो चुका है।बड़ा बेटा अजय इस समय हरियाणा रोडवेज गुरुग्राम में लिपिक है और जितेंद्र अपने परिवार सहित दिल्ली में शोरूम चलाता है।
वीरांगना से प्रेरणा ले रहीं बहू विमल यादव
बड़े बेटे अजय की पत्नी विमल यादव बताती हैं 60 साल की उम्र में भी उनकी सास घर संभालती हैं। 20 साल पहले जब वह शादी के बाद घर आईं तो सास के संघर्ष के बारे में जाना। आज भी गांव में उनके बलिदानी ससुर लालाराम का बड़ा मान-सम्मान है। अफसोस उनका गांव में कोई स्मारक नहीं है।
विज्ञापन

दादी से मिल रही संघर्ष की प्ररेणा

बलिदानी लालाराम की तीसरी पीढ़ी यानी बड़े बेटे अजय के बेटे आदित्य ने बताया कि वह 12वीं पास कर क्लैट की तैयारी कर रहा है। दादी से संघर्ष की प्रेरणा मिल रही है। गांव के बुजुर्ग भी उनके दादा के बारे में बताते हैं जब दादा सेना से छुट्टी पर आते थे तो गांव के बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के लिए प्रेरित करते थे।

फोटो संख्या:73- शहीद सिपाही लालाराम--फाइल फोटो

फोटो संख्या:73- शहीद सिपाही लालाराम--फाइल फोटो

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें