कड़ाके की सर्दी में यदि आपके पास सिर छिपाने की कोई जगह नहीं तो खुले आसमान के नीचे ही रात गुजारनी पड़ेगी। प्रशासन की तरफ से जरूरतमंदों के लिए इस कड़ाके सर्दी में सिर छिपाने के लिए रैन बसेरे जैसी कोई व्यवस्था अभी तक नहीं की गई है। जबकि उच्च न्यायालय के आदेश के बाद प्रशासन को इस तरह के इंतजाम करना आवश्यक है।
शहर में रैन बसेरे की तलाश के लिए अमर उजाला टीम ने रात 10 से 11 बजे तक शहर के रैन बसेरे का मुआयना किया। जिसमें 11 लोग कड़ाके की सर्दी में रैन बसेरे के बाहर रात गुजारते दिखे। किसी ने दुकान तो किसी ने रेलवे फुटओवर ब्रिज के नीचे आश्रय लिया हुआ था। अमर उजाला की टीम सबसे पहले बस अड्डा परिसर पहुंची। यहां पूरी तरह से सन्नाटा था। केवल एक मुसाफिर इंतजार करता मिला। गांव आकोदा वासी राजेंद्र ने बताया कि वह अपने भतीजे का इंतजार कर रहे हैं। उनकी आखिरी बस छूट गई। अब भतीजे को फोन कर बुलाया है।
टीम जब रेलवे स्टेशन पहुंची तो यहां स्टेशन के मुख्य गेट के पास ठंडे फर्श पर पतला सा कंबल लेकर एक व्यक्ति सोते हुए दिखाई दिया। जब उसको उठाकर पूूछा कि सर्दी के मौसम में यहां क्यों सो रहे हो, रैन बसेरे क्यों नहीं चले जाते। इस पर रामकरण ने कहा है रैन बसेरा, हमें तो मालूम नहीं। अंदर प्रतीक्षालय के गेट भी बंद पड़े हैं कहां जाएं।
टिकट घर के पास एक कंबल लेकर बैठे चिडोलिया गांव के निवासी धर्मपाल ने बताया हिसार जाने वाली ट्रेन छूट गई है। अब दूसरी ट्रेन सुबह 7 बजे आएगी। बेटी से अस्पताल में मिलने जाना है। अब रात को वापस गांव भी नहीं जा सकते। यहां स्टेशन पर ही रात गुजारनी होगी। रैन बसेरे के बारे में कुछ पता नहीं है। कहीं आग का अलाव भी नहीं दिख रहा।
नारनौल निवासी जगदीश अपने परिवार के छह लोगों के साथ बरेली जाने के लिए आए थे। परिवार के लोगों ने अपने साथ रजाई ले रखी थी। रजाई व कंबल लेकर फुट ओवर ब्रिज के नीचे पूरा परिवार लेटा था। उन्होंने कहा रैन बसेरे में बारे में कोई जानकारी है। रेलवे स्टेशन पर बने विश्रामगृह के गेट पर भी ताला लगा है।
रेलवे स्टेशन के बाहर बनी दुकानों के बरामदे में नारायण स्वामी खाना खाते दिखे। उनसे पूछा तो बोले सुबह हरिद्वार जाना है। रात को यहीं पर रहेंगे। रैन बसेरा कहां है, हमें तो मालूम नहीं। रैन बसेरा कहीं रेलवे स्टेशन के आसपास होता तो रात गुजार लेते, अब कहां खोजने जाएं।
उनके साथ ही कंबल लेकर बैठे महेंद्रनाथ ने कहा संतों के लिए कहां के रैन बसेरे । हम तो जहां जगह मिल जाएगी वहीं पर ठहर जाएंगे। रेलवे स्टेशन के अंदर विश्राम गृह के गेट भी बंद हैं। सरकार को व्यवस्था बनानी चाहिए। आम नागरिकों के लिए रैन बसेरे रेलवे स्टेशन या बस अड्डे के पास बनाने चाहिए।
अमर उजाला टीम ने एक आम मुसाफिर की तरह रेलवे स्टेशन, बस अड्डे पर कुछ लोगों से रैन बसेरे के बारे में जानकारी मांगी। कोई भी रैन बसेरे के बारे में नहीं बता सका। जब नगर पालिका स्थित रैन बसेरे का मुआयना किया तो यहां रैन बसेरे के नाम का कोई बोर्ड नहीं था। छत पर बने जिस कमरे को रैन बसेरा बताया गया वहां जाकर देखा तो नाक पर रूमाल रखना पड़ा। इसी कमरे में नगर पालिका का रिकार्ड पड़ा था। भीषण बदबू कमरे से निकल रही थी। यहां कोने में एक टूटा सा बेड था जिस पर गंदा सा बिस्तर भी दिखा। कोई यहां गलती से पहुंच भी जाए तो किसी भी सूरत में रात नहीं बिता सकेगा।
रैन बसेरों को व्यवस्थित करने के लिए संबंधित नगरपालिका एवं नगर परिषद के सचिव की ड्यूटी लगाई है। इसके लिए लेटर भी जारी किया है। सचिवों को दो से तीन दिन का समय दिया गया। सोमवार को आकर वो स्वयं भी रेन बसेरा चेक करेंगे।
- विश्राम कुमार मीणा, एसडीएम।