दो सौ बसों की दरकार लेकिन सुविधा डग्गामार
बसों के अभाव में ऑटो पर बैठने को मजबूर लोग, बसों के अभाव में मनमाने पैसे वसूल रहे निजी वाहन
फोटो नंबर एक से नौ
देवेंद्र यादव
नारनौल। देश की राजधानी के नजदीक होने और एनसीआर में शामिल होने के बाद भी जिला महेंद्रगढ़ के लोग अब भी सुचारु परिवहन सेवा से महरूम हैं। आज भी कई ऐसे रूट हैं, जहां पर रोडवेज की बसें नहीं दौड़ रहीं। इस कारण लोगों को ऑटो या अन्य डग्गामार प्राइवेट साधनों में जान जोखिम डालकर सफर करना पड़ रहा है। दो दिन पूर्व भी महेंद्रगढ़ में जो हादसा हुआ, उसका कारण कोथल खुर्द गांव में रोडवेज बसों का न जाना ही रहा है। इस कारण लोग ऑटो में बैठकर सफर तय करते हैं।
जिला महेंद्रगढ़ के साथ हमेशा से सौतेला व्यवहार किया जाता रहा है। यही कारण है कि आज भी जिले के लोग परिवहन जैसी मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं। जिला के अनेक ऐसे रूट हैं, जहां पर वर्षों से परिवहन सेवा नहीं है। ऐसे में यहां के लोग या तो प्राइवेट वाहनों का सहारा लेते हैं या फिर कोई भी वाहन न मिलने पर पैदल ही मीलों की यात्रा तय कर लेते हैं। ऐसा यहां के डिपो में बसों की कमी के कारण बना हुआ है। हालात यह हैं कि इन रूटों पर बसें चलाने के लिए न तो आज तक किसी नेता ने आवाज उठाई है और न ही अधिकारियों ने इस ओर ध्यान दिया है। हालांकि कई बार इन रूटों पर रहने वाले लोग और विद्यार्थी रोडवेज अधिकारियों से मिल चुके हैं, पर उनकी समस्या का समाधान नहीं हो पाया है।
कब-कब मिली डिपो को बस
रिकार्ड के अनुसार, फिलहाल नारनौल डिपो में 135 बसें ऑन रोड हैं, पर इन 135 बसों में से भी हकीकत में से करीब 125 से भी कम बसें ही चल रही हैं। नारनौल डिपो को मिलने वाली बसों के आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो सिर्फ 2011 को छोड़ कर अन्य वर्षों में डिपो को नाम मात्र ही बसें मिली हैं। आंकड़ों के अनुसार 2012 में 10 बसें मिलीं, 2011 में 45 बसें मिलीं, 2010 में 8 बसें मिलीं, 2009 में 24 बसें मिलीं, 2008 में 9 बसें मिलीं, 2007 व 2006 में मात्र 2-2 बसें ही डिपो को मिल पाई थीं।
हैं 135 बसें, आवश्यकता है 200 की
नारनौल रोडवेज डिपो के पास 148 बसें हैं, जिनमें से अब करीब 135 ऑन रोड हैं। वहीं धरातल पर करीब 125 बसों का ही परिचालन हो रहा है। डिपो की स्थापना से लेकर अब तक कभी भी बसों का यह 150 के आंकड़े को नहीं छू पाया। वहीं इनमें से भी अनेक बसें ब्रेक डाउन होने के कारण कार्यशाला में खड़ी रहती है। जहां क्षेत्र की आबादी लगातार बढ़ती जा रही है। वहीं बसों का बेड़ा लगातार सिमटता जा रहा है। क्षेत्र की आबादी को देखते हुए वर्तमान बसे क्षेत्र की आबादी के हिसाब से पर्याप्त नहीं है। आबादी के अनुरूप वर्तमान में करीब 200 बसों की आवश्यकता है।
स्थापना के बाद से नहीं बढ़ी है बसों की संख्या
नारनौल डिपो की स्थापना 1997 में हुई थी। उस समय डिपो के पास 125 बसें थीं, अब बसों की संख्या 145 है। इनमें से फिलहाल करीब 100 से 125 बसें ही रूट पर चल रही हैं। इनमें से रिकार्ड के अनुसार करीब 91 बसें लोकल रूटों और 45 बसें अंतरराज्यीय रूटों पर चल रही हैं। वहीं रोजाना 10-12 बसे रिपेयरिंग के लिए कार्यशाला में खड़ी रहती हैं। क्षेत्र की बढ़ती आबादी को देखते हुए फिलहाल नारनौल डिपो को लगभग 200 सौ बसों की आवश्यकता है।
इन रूटों पर है सबसे ज्यादा समस्या
नारनौल
नारनौल से भूषण शोभापुर
नारनौल-रामबास
नारनौल-डोहर मोहनपुर
नारनौल-चिंडालिया
नारनौल से नांगल काठा
नारनौल से कुलताजपुर
अटेली
अटेली-महेंद्रगढ़
अटेली-सिहमा
अटेली-नावदी रामपुरा
अटेली से नांगल राजपुरा
अटेली-गोकलपुर, हसनपुर व बोचड़िया
नांगल चौधरी
नांगल चौधरी-निजामपुर
नांगल चौधरी-बहरोड़
नांगल चौधरी-भेडंटी
नांगल चौधरी-धोलेड़ा
नांगल चौधरी-कारोता कमानियां
कस्बा से कस्बा नहीं रहा जुड़
मुसाफिरों की दिक्कतें
रोडवेज बसों की सेवाएं न होने के कारण उन्हें प्राइवेट वाहनों में सफर करना पड़ता है। इससे उनको काफी परेशानी होती है। मजबूरी में ऑटो आदि में सफर करना पड़ता है।
-सोनू कौशिक
बसों के अभाव में उन्हें अपनी जान जोखिम में डालकर प्राइवेट वाहनों में यात्रा करनी पड़ रही है। प्रशासन उनकी मांग की ओर ध्यान ही नहीं दे रहा है।
-धर्मेंद्र कुमार
ग्रामीण रूटों पर बसों के अभाव के कारण परेशानी होती है। कई बार प्राइवेट वाहन भी नहीं मिलते। जिसके कारण उन्हें पैदल ही अपना रास्ता तय करना होता है।
-राजकुमार
ग्रामीण रूटों पर रोडवेज की बसें न होने के कारण परेशानी होती है। बसों के अभाव में प्राइवेट वाहन चालक मनमाने पैसे ले रहे हैं। जान जोखिम में रखकर सफर करना पड़ता है।
-गंगाराम
एक दो ग्रामीण रूटों पर रोडवेज की बसें चलाई गई हैं। अन्य रूटों पर जहां भी आवश्यकता होगी वहां पर भी बसें चलाने के प्रयास किए जाएंगे। जहां कहीं भी जरूरत है, वहां बसें चला दी जाएंगी।
-सतीश कुमार, मुख्य निरीक्षक, नारनौल डिपो