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राजनीति की भेंट चढ़ी गोशाला की गायें

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फोटो नंबर 12
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अमर उजाला ब्यूरो
नारनौल। यहां की गोपाल गोशाला में मर रही गायें गोशाला की राजनीति की भेंट चढ़ी हैं। सूत्रों की मानें तो गोशाला की एडहॉक कमेटी में शामिल सदस्य एक दूसरे की टांग खिंचाई करते रहते हैं। वहीं पुरानी कमेटी भी राजनीति की भेंट चढ़कर ही भंग हुई थी। वहीं गोशाला में गाये मरने के बाद गायों को सही से भी दफन नहीं किया जा रहा है। इस पर पहले सवाल उठ चुके हैं।
यहां की गोपाल गोशाला वर्षों से विवादों में रही है। कभी यहां गायों की मौत को लेकर तो कभी यहां सही व्यवस्था नहीं होने के कारण या कभी प्रधान व अन्य पदाधिकारियों की खींचतान को लेकर हमेशा इस गोशाला में विवाद होता रहा है। ताजा विवाद इस गोशाला में गायों के मरने का हुआ है। वहीं इन विवादों की गहराई में जाएं तो साफ तौर पर पता चल जाएगा कि इन सबकी जड़ यहां की राजनीति है। यहां के सदस्य व पदाधिकारी एक दूसरे की टांग खिंचाई करते रहते हैं। इसका खामियाजा बेजुबां गायों को भुगतना पड़ता है। उधर, यहां की गायों को मरने के बाद सही से मिट्टी तक नसीब नहीं होती। गोशाला के कर्मी कई गायों को वैसे ही नदी के पास फेंक आते हैं। या जो गायें दफनाई जाती हैं, उनको सही ढंग से या बिना नमक डाले ही दफना दिया जाता है।
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करोड़ों की जमीन है मुख्य विवाद की जड़
गोशाला में जो भी प्रधान बने, उनको अन्य पदाधिकारियों या सदस्यों के साथ विवाद रहा। इसकी मुख्य जड़ गोशाला की करोड़ों रुपये कीमत की जमीन का होना बताया गया है। जो यदुवंशी स्कूल के साथ व कृष्णावति नदी के साथ लगती है। नदी के साथ होने के कारण इस जमीन पर बजरी भी निकलती है, जो कई पूर्व प्रधानों को बेची भी गई है। वहीं कइयों की नजर इस जमीन पर भी है।

दूध का नहीं कोई हिसाब
यहां की गायों से कितना दूध निकाला जाता है, इसका भी कहीं कोई हिसाब नहीं है। सूत्रों के अनुसार गायों का दूध गोशाला में बनने वाले प्रधान या सदस्य अपने घरों में सुबह व शाम को ले जाते हैं। इनका पैसा तक गोशाला में जमा नहीं कराया जाता है। वहीं किसको दूध दिया जाता है, इसका भी कोई हिसाब नहीं है।
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गोशाला में गायों के लिए किसी भी प्रकार की कोई कमी नहीं है। चारे-पानी की पूरी व्यवस्था है। गायों को मरने के बाद उन्हें नदी में सही से मिट्टी दी जाती है।
-बद्री प्रसाद, सदस्य एडहॉक कमेटी
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