संसाधन बना कबाड़, बच्चों में कैसे हो सुधार
आंगनबाड़ी केंद्रों मेें बच्चों को पोषाहार खिलाने के दावे, पेयजल का प्रबंध करने में सक्षम नहीं विभाग
फोटो नंबर 06
अमर उजाला ब्यूरो
नारनौल। अच्छी सेहत में खेलों का अहम योगदान होता है। इसलिए प्रत्येक आंगनबाड़ी केंद्र को खेल उपकरण मुहैया करवाए गए हैं, लेकिन अधिकतर केंद्रों पर ग्राउंड की व्यवस्था नहीं होने से करोड़ों के संसाधन कबाड़ साबित हो गए। दूसरी ओर जिले के एक भी सेंटर पर स्वच्छ पेयजल के प्रबंध नहीं है। इसके अलावा भी कई केंद्रों पर सुविधाआें की कमी है।
बता दें कि महेंद्रगढ़ जिले में 1201 आंगनबाड़ी केेंद्र संचालित हैं। जिनमें वर्कर व हेल्परों की नियुक्ति की गई है। उन्हें हर महीने करोड़ों का सामान सप्लाई होता है, ताकी बच्चों को पौष्टिक आहार मिल सके। सरकार का तर्क है अधिकांश ग्रामीण संतुलित भोजन की परिभाषा नहीं जानते है और जागरूकता के अभाव में बच्चों के भोजन में बदलाव नहीं करते। एक ही प्रकार के व्यंजन खाने से शरीर में पोषक तत्वों की अधिकता व कमी की समस्या उत्पन्न हो जाती हैं। जिसके प्रभाव से मोटापा, दुबलापन, चिड़चिड़ा स्वभाव होने लगता हैं। चिकित्सकों के मुताबिक नौनिहालों को कैलोरी, वसा, कैल्शियम, प्रोटीन आदि निर्धारित मात्रा में मिलनी चाहिए। इसलिए 500 की आबादी पर एक आंगनबाड़ी केंद्र निर्धारित कर दिया गया। 6 माह से 6 साल तक बच्चों की सुविधा को लेकर नांगल चौधरी ब्लॉक में 213 सेंटर कार्यरत हैं। केवल 62 आंगनबाड़ी केंद्र ही विभागीय भवनों में स्थापित हैं। 20 केंद्र पंचायत घर, 45 स्कूलों में, 18 हरिजन चौपालों में, नवजीवन ग्रह में 25 केंद्र संचालित हैं। धर्मशाला में 20, उप स्वास्थ्य केंद्रों में 3 और 21 आंगनबाड़ी केंद्र निजी भवनों में कार्यरत हैं। स्वास्थ्य सुविधा को लेकर करीब पांच साल पहले केंद्रों को खेल संबंधित संसाधन उपलब्ध कराए गए थे, लेकिन ग्राउंड के अभाव में संसाधनों का इस्तेमाल नहीं हो रहा है। जंग लगने के कारण कई उपकरण कबाड़ बन चुके हैं। इसके अलावा आंगनबाड़ी केंद्रों पर बिजली कनेक्शन की व्यवस्था नहीं है। इस कारण नौनिहालों को गर्मी का सामना करना पड़ता है।
शौचालय की नहीं सुविधा
सरकार की ओर से आंगनबाड़ी केंद्र व स्कूलों में शौचालय अनिवार्य कर दिया है। प्रशासनिक सर्वे के बाद महेंद्रगढ़ जिला ओडीएफ घोषित भी हो चुका है, लेकिन आंगनबाड़ी केंद्रों में शौचालय की सुविधा उपलब्ध नहीं है। छोटे बच्चों को बार-बार शौच करने की समस्या रहती है। उन्हें मजबूरन खुले में शौच जाना पड़ता है।
पोषाहार से अधिक पेयजल की चिंता
विभागीय सूत्रों के मुताबिक जिले के आंगनबाड़ी केंद्रों में 70 हजार से अधिक बच्चे, आठ हजार गर्भवती महिलाएं पंजीकृत हैं, लेकिन अधिकांश सेंटरों पर बिजली-पानी के कनेक्शन नहीं हैं। पेयजल के लिए बच्चों को इधर-उधर भटकना पड़ता है। हालांकि वर्कर व हेल्पर मटके में पानी का प्रबंध करती हैं। किंतु पर्याप्त नहीं होने के कारण अव्यवस्था बनी रहती है।
चूल्हे के धुआं से स्वास्थ्य प्रभावित
करीब चार साल पहले आंगनबाड़ी केंद्रों को गैस चूल्हा मुहैया कराए गए थे। विभिन्न कारण के चलते 40 प्रतिशत सेंटरों को गैस सिलेंडर नहीं मिले। इनमें परंपरागत चूल्हे पर खाना पकता है। इसके धुएं से बच्चे व गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य पर दुष्प्रभाव पड़ रहा है।
बिजली-पानी का नहीं है बजट
जिला सहायक परियोजना अधिकारी नंदराम ने बताया कि आंगनबाड़ी केंद्रों में बिजली-पानी मुहैया करवाने के लिए बजट उपलब्ध नहीं है। 30 केंद्रों को गैस कनेक्शन उपलब्ध नहीं हुए। जिनमें चूल्हे पर खाना बनाना मजबूरी है। जगह के अभाव में खेल संसाधनों का इस्तेमाल संभव नहीं हो रहा।
372 केंद्रों का विभागीय भवन उपलब्ध
विभाग के एसए राधेश्याम ने बताया कि केवल 372 आंगनबाड़ी केंद्र विभागीय भवनों में कार्यरत हैं। 829 सेंटर धर्मशाला, निजी मकान, स्कूल, चौपाल आदि में संचालित हैं। रिपोर्ट उच्चाधिकारियों को भेज रखी है। बजट मिलने पर निर्माण प्रक्रिया शुरू करना संभव होगा। कुपोषणता की रोकथाम को लेकर विभाग ने अभियान चला रखा है।