अमर उजाला ब्यूरो
नांगल चौधरी। सरकार ने पिछले साल नांगल चौधरी ब्लॉक को ओडीएफ घोषित कर दिया था। इस काम को सिरे चढ़ाने के लिए अधिक खराब स्थिति वाली पंचायतों में सार्वजनिक शौचालयों का निर्माण करवाया गया। लेकिन, हकीकत में स्थिति इसके विपरित है। पंचायतों में बने शौचालयों महज शोपीस बनकर रह गए हैं। इन शौचालयों का प्रयोग ही नहीं हो रहा है। स्थिति ये बनी है कि पंचायतों में बने सार्वजनिक शौचालयों में पानी का प्रबंध नहीं होने से ताले लटके पड़े हैं। पंचायतें शौचालयों में पानी का प्रबंध नहीं कर पाई। शौचालयों में पानी की सुविधा नहीं होने से करीब 60 प्रतिशत लोग आज भी बाहर खुले में शौच जाने को मजबूर हैं।
शौचालय पर खर्च पैसा गया बेकार
जनता को खुले में शौच के प्रति जागरूक करने से थके-हारे अधिकारियों ने जब योजना को सिरे चढ़ते नहीं देखा तो विभाग ने दिसंबर 2017 में पंचायती स्तर पर सार्वजनिक शौचालय का निर्माण करवाने का फैसला लिया। विभाग ने उन गांवों को चुना है जहां खुले में शौच की स्थिति ज्यादा खराब थी। विभाग ने पंचायत स्तर पर बनने वाले शौचालय की राशि भी 12 हजार रुपये प्रति शौचालय निर्धारित की। इतनी कम राशि में शौचालय का निर्माण करवाना सरपंचों के लिए मुसीबत भी बना। सरपंचों काम को सिरे चढ़ाया गया और ढांचा तैयार किया। लेकिन शौचालयों पर पानी के प्रबंध व सफाई कर्मी की नियुक्ति को गंभीरता से नहीं लिया। यह प्रयास सिर्फ गांव को ओडीएफ घोषित करवाने तक ही सीमित रहा।
इन गांवों को मिला था सार्वजनिक शौचालयों का लाभ
नियामतपुर को 12 शौचालय, धौलेड़ा को आठ, ढाणी जाजमा(दताल) को पांच, मूलौदी को आठ, आकोली को आठ, दौंगल को आठ, बूढ़वाल को 12, मौरूंड को 15, भुंगारका को 20, गोठड़ी को 15, भेंडंटी को आठ, बिहारीपुर को छह, छापड़ा बीबीपुर को 10, दौंखेरा को 10, थनवास को 12, तोताहेड़ी को आठ, आसरावास को 10, दताल को 10, लूजोता को आठ, शहबाजपुर को आठ, नायन को 12 व कालबा को आठ शौचालय मिले थे।
डार्क जोन के चलते पानी की गंभीर समस्या बनी हुई है। पंचायतों को कई बार शौचालयों पर पानी के प्रबंध के लिए निर्देश दे चुके हैं लेकिन पंचायतों के प्रयास के बाद भी शौचालयों पर पानी का प्रबंध नहीं हो पा रहा है। इसके पीछे पानी की कमी ही मुख्य वजह है।
-महेश, ग्राम सचिव बीडीपीओ कार्यालय नांगल चौधरी।